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नव वर्ष पररचनाएँ

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ऐसे करे नव वर्ष का स्वागत :::::::::::::::::::::::::::::::::::;:::; निकलने वाला प्रत्येक दिन बीतता हैं और बीतते दिनों के साथ महीने और साल भी बीत जाता हैं |इसीतरह यह साल भी बीत रहाँ हैं क्या बीत गया कहना ही उचित होगा क्यों कि यह अंतिम सप्ताह हैं |इस साल का और यह भी जाने वाला हैं क्यों कि समय किसीके लिए रुकता नही तो यह दिन , महीने और साल कैसे रुक सकते हैं |         यह साल बहुत ही दर्दनाक रहाँ कोरोना जैसी आपदा से सारे विश्व को लढना पड़ा इस दौर में बहुत ही अच्छी - अच्छी हस्तियों को हमे खोना पड़ा किसी परिवार का सहारा चला गया तो , किसी के सिर से ममता का आँचल तो किसी के माँग का सिंदूर तो किसी के घर का चाँद तो किसीके दिल का बहार चला गया मगर यह साल हमे एक सिख दे गया कि वक्त कैसा ही क्यों ना हो वह बीत जाता हैं  सिर्फ हमे सब्र के साथ खुद में एक सकारात्मक सोच बनाए रखनी चाहिए | यह सिख हमारे जीवन मे हर पल एक मार्गशक के रूप में रहेगी और रहेगी भी इसी तरहाँ यह साल कुछ खटा - मिट्ठा रहाँ और अब हमारे बिछ से भी विदा हो रहाँ हैं  |           मेर...

मन्नू भंडारी जी को श्रद्धांजलि

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                                मन्नू भंडारी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि                💐💐💐💐                                      हिंदी साहित्य जगत में बहुत से कालजयी रचनाएँ हैं | उनमें आपका बंटी यह कृति आज वर्तमान में आधुनिकता कारण हो रहे परिवार विघटन का चित्रण करने वाली कृति हैं | माता का घर मे झगड़ा , तनाव और इसका बच्चों पर होने वाला परिणाम आज भी यह समस्या बड़े पैमाने में देखने को मिलती हैं |           कोई भी साहित्यिक कृति किसी भी काल मे प्रासंगिक लगती हैं तो मुझें लगता हैं कि वह कृतिकार ही कालजयी हैं रचना नही ऐसी बात मन्नू  भंडारी जी पर बैठ सकती हैं क्यों कि उन्होंने तत्कालीन समय लिखा साहित्य आज हम पढ़ते हैं तो लगता हैं कि यह तो आज का चित्रण हैं | मेरे पड़ोस का ही नायक हैं इतना ही नही तो कही कहि लगता हैं कि अरे यह तो मेरा आज ...

दीपावली पर हिंदी रचनाएँ

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।।दिया जलाओं तम हटाओं।। दिया जलाओं तम हटाओं, रौशनी घर घर फैलाओं। गमों का अंधेरा रह न जाए, खुशियों का पहरा लगाओं। झाँक लेना घर भी उनके,मिट्टी को आकार जो देतें, सपने उनके मिट्टी से हैं मिट्टी में दुनिया बसे । घर हमारे दीप जलें जो उनकी मेहनत से ही आतें, हम सजाएं दीपमाला चेहरे उनके खिल जाते। चीनी सामानों को छोड़ों मिट्टी के दीये जलाओं, संग कुम्हारों के भी अपने त्योहारों की खुशी मनाओं। चेहरे को मिल जाए सुकून कांपते हाथों को बल , कमजोर जो आर्थिक रूप से हम भी बने उनके संबल । दीपों कि माला सजाओं, रौशनी दरबार लगाओं रोते आँसु को हंसाओं रागिनी दिप राग सुनाओं। दीपावली के पावन पर्व पर खुशियाँ मनाएं भरपूर हम, महलों की रौनक हो कुटिया, में आओं आज मिटाएं तम। दिया जलाओं तम हटाओं, रौशनी घर घर फैलाओं, गमों का अंधेरा रह न जाए, खुशियों का पहरा लगाओं। बबिता अग्रवाल कँवल सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल ---------------- -------- -- ---- -------------------/---------      दीपाली दिप ना ईद चांद बिना होली नही है रंग बिना  दिवाली दीप बिना जीवन ना पूर्ण संत बिना  मिलाये ईद बिन...

स्त्री-पुरूष समता (जेंडर इक्वॅलिटी- लैंगिक समानता) आखीर कहें किसे?

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स्त्री-पुरूष समता (जेंडर इक्वॅलिटी- लैंगिक समानता) आखीर कहें किसे?        भारतीय संविधान, कलम १४,१५ के तहत भारतवासियों को समता का अधिकार देता है। और इसके तहत "धर्म, वंश,जात,लिंग और प्रांत के आधार पर सरकार या किसी भी व्यक्ती के द्वारा देशवासियों के साथ कोई भी गैर सलूक (भेदभाव) नहीं किया जा सकता। या इस तरह के असमानता पूर्ण रवैये को संवैधानिक तौर पर अनुमती नहीं देता। कलम १५-(१) और (२) के तहत धर्म, वंश, जात, लिंग और प्रांत इनमें से किसी भी एक या अनेक कारणवश, कहीं भी चाहे वह सार्वजनिक स्थल (दुकान, हाॅटेल, बाग, रस्ते, तालाब, कुआॅ इत्यादी) हो, या किसी की स्वयं की खरिदी हुई व्यक्तिगत जगह पर आना, जाना, इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध  नहीं किया जा सकता। और यही आर्टिकल १५(३)महिला और बालकोंके हित के लिए विशेष कानुनी व्यवस्था करने का   हर राज्य को विशेषाधिकार भी प्रदान करती है। चाहे वह शिक्षा हो, नोकरी हो, या  विशेष कानुनी संरक्षण हो। जेंडर इक्वलिटी ,लैंगिक समता जिसे हम स्त्री-पुरुष समानता भी कहते है, यह हमे दो स्तर पर देखने को मिलती है। एक संवैधानिक स्...

प्रेमचंद पर कविता जीवनी

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जीवनी ==================== उंगलियाँ हर किसी पर ऐसे ना उठाया करो , उठाने से पहले खुद कुछ कमाया करो  | मुझें तो हर जीव में भीतर एक भोला इंसान दिखता हैं , मुंशी प्रेमचंद का एक सचमुच बृहद एक कथा संसार सा दिखता हैं | मंदिर में दान खाकर , चिड़िया मस्जिद में पानी पीती हैं , और था एक प्रेमचंद जो बच्चों को इदगाह सुनता था | कभी श्री कृष्ण , की लीला गाता, तो कभी रसखान सुनता था | बाकियों को दिखते होंगे हिन्दू और मुसलमान , मुझें तो हर जीव में भीतर एक भोला इंसान दिखता हैं | उंगलियाँ हर किसी पर ऐसे ना उठाया करो , उठाने से पहले खुद कुछ कमाया करो |                                       कवयित्री         सुगंधा राजुलाल चाबुकसवार

प्रेमचंद होने का मतलब

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प्रेमचंद होने का मतलब प्रेमचंद होने का मतलब स्वयं हर पात्रों को जीना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब गुलामी में भी स्वाभिमान के साथ आजादी के भावरस को छीनकर छककर पीना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब जनपद के शोषक डिप्टी कलक्टर के आगे गर्व से शोषित घर का कलक्टर होकर अड़ जाना  होता है। प्रेमचंद होने का मलतब जेल की परवाह किए बगैर शोषक के विरुद्ध क्रान्ति की मशाल लेकर आगे बढ़ना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब आवश्यकतानुसार नाम और भाषा बदलकर भी पहचान न खोना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब हर तरह की सामाजिक असमानता और सांस्कृतिक पिछड़ेपन को मुखर स्वर देना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को आत्मसात करना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब देश के प्रति भूख प्यास भूल जाना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब गोदान हो जाना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब कीचड़ में होने पर भी पंकज हो जाना भी होता है।  डॉ अवधेश कुमार अवध मेघालय 8787573644

कुशवाहा कान्त : एक जासूस की मौत - मिस्ट्री

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कुशवाहा कान्त : एक जासूस की मौत - मिस्ट्री           डॉ. अवधेश कुमार 'अवध' साहित्यिक उपज की दृष्टि से काशी प्राचीन काल से उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक उर्वर भूमि है। इस भूमि पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साहित्यिक मशाल को प्रसाद, प्रेमचंद और रामचन्द्र शुक्ल के साथ ही जलाए रखा एक चिर युवा साहित्यकार ने जिसका जन्म काशी के निकट मिर्जापुर में हुआ था किन्तु कर्मस्थली पावन काशी रही। अंग्रेजों की हुकूमत में जनमानस गुलामी के कारण पहले से ही सहमा हुआ था और ऊपर से दिसम्बर की हाड़ कपकपाने वाली शीतलहर का प्रकोप। 9 दिसम्बर सन् 1918 को मिर्जापुर के महुवरिया में बाबू केदारनाथ को एक ऐसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसके बारे में कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह बालक साहित्य को नई दिशा व नया आयाम देगा। जी हाँ, शिशु कुशवाहा कान्त के पाँव पालने में ही तरुणायी का भान कराने लगे थे। उस वक्त देवकी नन्दन खत्री के तिलस्मी उपन्यास का खुमार छाया हुआ था। जब ये नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तो इन्होंने 'खून का प्यासा' जासूसी उपन्यास लिखा। जल्दी ही ये कुँवर कान्ता प्रसाद के नाम से ख्याति अर्जित करने लगे थे...

पर्यावरण

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पर्यावरण तरुवर अति पावन,बहुत सुहावन,यह बहु बिधि सुखकारी l कुछ पौध लगाओ,रोग भगाओ,हो विकसित फुलवारी ll छाया मन भाये,मेघ बनाये,हर्षित नर अरु नारी l धरती मुसकाती,कोयल गाती,फल से नत तरु भारी ll आक्सीजन दाता,नेह लुटाता,वृक्ष देव कहलाते l हम पूजें इनको,रजनी दिन को,रक्षा तिलक लगाते ll दीनों की आशा,जन्तु निवासा,राहगीर पुनि आते l ये   रैन   बसेरा, सबका  डेरा,पा आश्रय  हरषाते ll ये भगवन दूजा,कर लो पूजा,पर्यावरण सुधारो l कर  इनकी सेवा,पाओ मेवा,इन पर निज को वारो ll ऋगुवेद   सुनावे,जन   जन गावे,दस  पुत्रों सम धारो l यह कर्म पुनीता,वेद सुनीता,जीवन जन्म सँवारो ll डॉ अवधेश कुमार 'अवध' 8787573644

रिश्तें निभाने हैं तो सिखों इन चीजों को

          रिश्तें निभाने हैं तो सिखों इन चीजों को :::::::::::::::::::::::::::::: :::::::::::::::::::::::::::::: :::::::::::::::              आज जो भी अपने रिश्तें को , रिलेशनशिप को बेहतर बनाना चाहता हैं | चाहें वह लड़का हो या लड़की , महिला हो या पुरुष किसी भी उर्म का शख्स निम्नलिखित बातों को ध्यान से पढ़कर अपने रिश्तें में  अप्लाई करता हैं तो वह रिश्तेदारी का सम्राट बन जाएगा |               मनुष्य जीवन में  रिश्तों को काफी अहमियत हैं | क्यों कि हर इंसान का व्यवहार , बर्ताव तथा सामाजिक दायरा यह सब रिश्तेंदार तथा समाज के लोग तय करते हैं | प्रत्येक इंसान अपनी जिंदगी में कितने रिश्तें बनाता हैं , तोड़ता हैं | सुना हैं कि रिश्तेंदारी की दुनियाँ जिसने सीखी उसने तो जिंदगी सीखी | आज- कल कॉलेज लाईफ में न जाने कितने दोस्त मिलते हैं , कितने रिश्तें बनते हैं | मगर उसे निभाना हर किसी को कहाँ आता हैं | उदाहरण कहाँ जाएँ तो एक छोटीसी स्टेपलर पिन अनेक कागजो को एकत्रित , सभी ...

श्रद्धेय विनायक दामोदर सावरकर

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श्रद्धेय विनायक दामोदर सावरकर यह एक व्यक्ति मात्र नहीं, एक संस्था मात्र नहीं अपितु एक अक्षय विचारधारा का नाम है। वह विचारधारा जो गुलामी की स्याह कारा में रहकर भी आजादी का लौ जला सकती है। वह विचारधारा को गुरुगोविन्द सिंह की तरह अपने समस्त परिजनों को बलिवेदी के निमित्त न्यौछावर कर सकती है। वह विचारधारा जो उस भविष्य के चलचित्र को देख सकती है जिसे जनसाधारण की नंगी आँखें कभी देख नहीं पातीं। विश्वविद्यालयी डिग्रियों से निर्मित विवेक कभी समझ नहीं पाते।  वीर सावरकर का सबसे स्तुत्य कार्य रहा 1857 के संग्राम को *प्रथम स्वातन्त्र्य समर* नाम देना। यह दुनिया की वह पुस्तक है जो छपने से पहले ही प्रतिबंधित कर दी गई थी। यह जलवा रहा सावरकर जी की लेखनी का। आज यह पुस्तक विश्व की कई भाषाओं में उपलब्ध है जबकि प्रकाशन के समय समस्त ब्रितानी हुकूमत ने समस्त अंग्रेजी, हिंदी और मराठी प्रेसों को बंद करा दिया था। लाल लट्टुओं का मानना था कि सावरकर जी कि पुस्तक इन तीन भाषाओं में ही निकल सकती है। हकीकत यह है कि उस समय के तमाम क्रान्तिकारियों ने अलग अलग भाषाओं में अनुवाद करके प्रकाशन का बीड़ा उठा लिया था।  इस ...

नए पीढ़ी का निर्माण

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                लेखक मारोती गंगासागरे नए पीढ़ी का निर्माण -------------------------------------   परिवर्तन होना चाहिए और हो भी रहाँ हैं | मगर कहाँ हो रहाँ हैं सिर्फ जिस्म में हो रहाँ हैं | आज कल पढ़े-लिखे लोग भी परिवर्तन शील हुए मगर सिर्फ वह रहन, सहन, खान-पान इन चीजों में ही बदल गए जहाँ बदलना था वहाँ तो नही... स्कूल , कॉलेज की शिक्षा को हमने सिर्फ परीक्षा तक ही सिमित रखा हैं | उस शिक्षा में जो मूल्य थे वह हमने कहाँ अपनाए ? मैं और यह भी बताना चाहता हूँ कि शिक्षा का फायदा सिर्फ नौकरी ही नही समाज मे अच्छा हमारा बर्ताव तथा घर मे भी हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए यह भी बात जहन में आयी तो भी हमारे शिक्षा का फायदा हुआँ समझिए |          बहूत से लड़के लडकियाँ कॉलेज के जीवन मे प्रेम कर बैठते हैं | कहाँ जाएँ तो प्रेम करना गलत नही यह एक अवस्था हैं और इसमे यदी आप प्रकृति नियम अपनाते हैं तो लाजवाब अनुभव मिलते हैं | मगर प्रेम को आज के युवाओं ने सिर्फ शारीरिक सुख एक भोग विलास यही समझा हैं | यदी प्रेम हो जाएँ   तो हो...

हिंदी भाषा का प्रसार प्रचार

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हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार एवं विकास हिन्दी भाषा लगभग 5००० साल पुरानी है।अमीर खुसरो ने सबसे पहले इस भाषा को हिंदी नाम दिया, ऐसा माना जाता है। सिंघू नदी के किनारे बसी मानव सभ्यता भारत की सभ्यता है। सिंधू नाम इरान जा कर अपभ्रंश हो कर हिंदी   पुकारा गया। चीन की भाषा मेडेमिन सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है,इस के बाद नम्बर आता है हिंदी भाषा का जिसे लगभग ७० करोड़ लोग बोलते समझते हैं। हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है। फिर भी हिंदी को राष्ट्रभाषा जैसा सम्मान नहीं मिला है। भारत में भी अंग्रेजी भाषा बोलने समझने वाले ‌नागरिक को ज्यादा सम्मान मिलता है,आमतैर पर। भाषा आदमी सीखता है नोकरी धंन्धे हेतू सामान्य तौर पर।कम्पूटर ओर नेट के जमाने में अंग्रेजी भाषा बोलने समझने वाले ‌नागरिक को ज्यादा अवसर रोजी-रोटी हेतु। इसलिए भी हिंदी पिछड़ रही है। अदालत में भी जिक्र अंग्रेजी में होती है बड़ी अदालत में।फैसले भी अंग्रेजी में लिखे जाते हैं। भारत सरकार को हिंदी में बड़ी अदालत में जिरह हौ, फैसले हिन्दी में लिखे जाये ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। हिंदी भाषा का विस्तार रोज हो जैसा अंग्रेजी के लिए ओकस्फोड युनिवर्...

सियाराम

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हे शक्ति पुंज!हे पूर्णकाम हे अविनाशी,घट घट वासी तुम सदय विराजो सियाराम। हे कृपासिंधु!हे करुणाकर, हे जगत नियंता दीनबंधु बस जाए हम सबके हृदयों में पावन पुनीत तव छवि ललाम। जग संचालित हो तुमसे ही जग प्रतिपालित हो तुमसे ही तुम सदय विराजो सियाराम। निज ज्वाल भरो हम सबमें तुम यह विश्व प्रदीपित हो जिससे तम रह न सके इस वसुधा पर फैले प्रकाश जय सियाराम तुम सदय विराजो सियाराम। स्वरचित, मौलिक डॉ मधु पाठक राजा श्रीकृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश।

अवधपति! आओ

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अवधपति! आओ हे राम  मुझे  अपना लो। निज चरणों में बैठा लो।।         हे    राघव     अन्तर्यामी।         तुम हो दीनन के स्वामी।। हे पुरुषोत्तम     योगेश्वर। तुमसे समस्त सचराचर।।         जग   की  पीड़ा  के हर्ता।         तुम सकल कर्म के कर्त्ता।। तुम हो ब्रह्माण्ड नियंता। भक्तों - संतों  के  कंता।।         तुम   प्राणवायु   के   दाता।         तुम हो विधि और विधाता।। हे अगम  अगोचर  अक्षय। जै  जै जै जै जै जय जय।।        जग में  सुख-शान्ति बनाओ।        सुन अवध,अवधपति आओ।। डॉ अवधेश कुमार अवध 8787573644

शीर्षक-- गोमती के तट

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विधा-  लघुकथा =========== शीर्षक-- गोमती के तट =============== शीतल रोज विद्यालय जाती तो उसे नदी पार करना होता था। वह अपनी साइकिल धीरे करना चाहती पर नहीं करती क्योंकि समय से विद्यालय पहुंचना होता था। शीतल बहुत ही शिष्ट और संस्कारी लड़की है। माता-पिता तथा परिवार से मिली सीख  और विद्यालय में गुरूजनों से‌ मिला सद्ज्ञान उसे समय का पाबंद बनाए रखता। प्रतिदिन गोमती नदी पार कर विद्यालय जाती तो उसे लगता नदी के आसपास कुछ अलग तरह की स्थितियां हैं ।एक तरफ मंदिर हैं जहां श्रद्धालु पूजा पाठ में लगे दिखते जबकि दूसरी तरफ कुछ झुग्गी-झोपड़ियां दिखाई पड़तीं जिसमें  कुछ ग़रीब परिवार रहते थे।जो बांस की टोकरी,डलिया आदि सामान तैयार करते बेचते और उसी से अपने परिवार का पेट पालते। दूसरी तरफ कुछ ऊंचे-ऊंचे भवन दिखाई पड़ते। बड़ी बड़ी गाड़ियां खड़ी दिखाई देतीं। अक्सर वह मन में सोचती सड़क के दोनों तरफ़ का दृश्य कितना अलग है और जीवन का आधार भी अलग है जबकि गोमती और उसके तट तो सबके लिए एक जैसे हैं ।पर इंसानी दुनिया जो उसने खुद गढ़ी है उसमें सबके लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं क्यों हैं जबकि हर इंसान एक सा दिखता ह...

नवरात्रि की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

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आप सभी को पावन  नवरात्रि की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। मां आदिशक्ति आप सब पर सदैव अपनी कृपा बनाए रखें। *मातारानी के श्रीचरणों में अपने भाव पुष्प अर्पित करती हूं।* 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 "मातु वंदन तुम्हारा और पूजन करें भरके श्रद्धा से मन नित नमन हम करें। सुनलो अरज मेरी अम्ब विनती करें ग़र लड़ें शत्रु से तो विजय ही करें। दे दो वरदान हमको हे वरदायिनी हे सुता शैल की मातु कात्यायनी। कर कृपा अपनी सबको उबारोगी तुम सत्य की जीत को खल को मारोगी तुम। इस जगत में तो वैसे ही ग़म कम नहीं काम और क्रोध के अब सितम कम नहीं। है मनुजता बहुत ही पशोपेश में अम्ब होता है क्या देखो इस देश में। बेटियां जो की प्रतिछवि तुम्हारी ही हैं कुछ नराधमों के लिए भारी ही हैं। कोख में उनको कैसे सुला देते हैं? ग़र जनम लीं तो कैसे रुला दते हैं? मातु दुष्टों को अब कब संहारोगी तुम ? जो पशु हैं बने कब उद्धारोगी तुम? ये कोरोना भी असुरों की ज्यों टोलियां अम्ब जग को बचालो हम फैलाते झोलियां। डॉ मधु पाठक, हिन्दी विभाग राजा श्रीकृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर उत्तर प्रदेश।

निशदिन ही आना होता है |

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सुप्रभात  बागों में नूतन फूलों का, खिलकर मुसकाना होता हैl अम्बर में प्रात: सूरज का, निशदिन ही आना होता हैll सपने बुनकर सो जाते जो, उनको जग जाना होता हैl अम्बर में प्रात: सूरज का, निशदिन ही आना होता हैll थककर  चूर चाँद तारों का, नभ से फिर जाना होता हैl अम्बर में प्रात: सूरज का, निशदिन ही आना होता हैll बिगुल फूँककर कर्मभूमि में, कौशल दिखलाना होता हैl अम्बर में प्रात: सूरज का, निशदिन ही आना होता है।। डॉ अवधेश कुमार 'अवध'

राहुल सांकृत्यायन

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हिन्दी साहित्याकाश के अद्भुत, अपूर्व, अविस्मरणीय,चिरदीप्तिमान नक्षत्र, महान् घुमक्कड़,महाज्ञानी, महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी की आज जन्म जयंती है।उनका साहित्य सृजन अपनी विपुलता में इतना विस्तृत है कि उसे आसानी से समेट पाना मुश्किल है।वे एक अद्भुत यायावर होने के साथ-साथ बहुभाषाविद,गहन अनुसंधेता, दार्शनिक, इतिहासकार, कथाकार, यात्रा वृत्तांत साहित्यिक विधा के पितामह थे। वे विपुल साहित्य के समर्थक थे। उनकी महत्वपूर्ण कृतियां--" वोल्गा से गंगा", "जय यौधेय", "सिंह सेनापति","दिवोदास","मध्य एशिया का इतिहास,""बौद्ध दर्शन", "विश्व की रूपरेखा", "दर्शन दिग्दर्शन", "वैज्ञानिक भौतिकवाद", "इस्लाम धर्म की रूपरेखा", "मेरी लद्दाख यात्रा", "मेरी चीन यात्रा","रूस में पच्चीस मास", "हिन्दी काव्य धारा", "दक्खिनी हिन्दी काव्य धारा","सरहपाद दोहा कोश","भागो नहीं दुनियां को बदलो", "घुमक्कड़ शास्त्र",आदि महत्वपूर्ण कृतियां हैं। "स...

जख्मी औरत

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जख्मी औरत जा बेटा एक ईंट ले आ कहीं से। बड़ी जोर से मारा है पुलिस ने। बड़ा दर्द हो रहा है। ईंट को गर्म कर के सिकाई करूंगा। दादा बोले। लड़का ईंट लेने चला गया। तुम से कहीं थी पुलिस मार रही हैं मत जाओ । बेटा बोला। अब हमने सोचा हमको काहे मारेगो पुलिस ? हमनै चोरी थोड़ी की है। पर ये पुलिस मार काहे रही है बेटा?  बता रहे हे कोई छूत की बीमारी फैली है। मुन्ना बोला। तो बीमारी क्या हमने फोलाई जो हमें मारा। अब पुलिस से कोन पूछे। कितने दिन तक बाहर नहीं निकल सकते?  पता नहीं। ऐसा पहली बार है।  तो आपने गांव वापस चलें। कैसे जा सकते हैं? बस रेल सब सुनने में आया है कि बन्द है। हमारी तो इतनी उम्र हो गई मगर ऐसा कभी ना तो देखा ना सुना। झोपड़ी में आटा है?   हां है तो एक दो दिन चल जायेगा। फिर देखे क्या होता है। बाकी तो सब ठीक ही है मगर  लूगाई की चिंता है। उस के पूरे दिन चल रहे हैं कभी भी बच्चा हो सकता है। बस रेल नहीं चलेंगी तो हम सब तो पैदल चल देंगे मगर औरत जात पेट से है उसका  क्या करे?  वो जिस दाई के भरोसे आई थी शहर ‌वो बोल रही है ये ही हाल रहा तो वो  तो चली जितेगी। ...

होली आयी रे

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होली आयी रे (कविता) होली  आयी रे ,  होली  आयी रे, मुझे गुलाल लगाने भाभी आयी रे‌। सब  को  होली में  बहुत बधाई रे, होली  में है  सब  की  परछाई  रे। धूम - धाम  से मैं  होली मनाऊं रे, अबीर  लगाने  प्रिय को बुलाऊं रे। आज खूब शुभ-शुभ दिन है हरपल रे, हर घर- आंगन,सड़क पे है हरचल  रे‌। पुआ खाकर अब होली मनाओ रे, पिचकारी  लेकर  यहां  आओ रे। रोचक  प्यारी  है  होली  के  दिन रे, मन नहीं लगता आज प्रिय के बिन रे। होली  के  दिन  मेहमान  आया रे, और  थैला  में  पकवान  लाया रे। सब से प्यार करें इस होली में रे,  रंग - अबीर सब रखों झोली में रे।    अनुरंजन कुमार "अंचल"      साहित्यिक नाम      कुमार "अंचल"        कवि/शायर        अररिया, बिहार       7488139688

जल और वृक्ष

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जल और वृक्ष अलका जैन जल है तो जीवन यार दोस्त वरना बंमाड में जीवन कहां शबनम की बूंद सी प्यास हमारी बहा रहे दरिया बेकार बेमक़सद सावन में जो सहेजें जल पानी छत का पानी रोक वहीं सयाना बरसात  देती पानी प्यासी धरती को सावन में जो चाहो  जल बरसे  यारो निमंत्रण देने बरसात को वृक्ष लगा जल उपर से नहीं सोना बरसे यारो किसन की मेहनत रंग लाये पैसा जब बाजार में तब जाकर आये यार पानी बने सोना जब प्यापारी हर्षाते गांव गांव गली गली में लक्ष्मी आती जल कीमत अनमोल राज जान ले किसी प्यासे पूछ पानी कितना  मोल बूंद बूंद पानी देता जीवन जीवन को  बूंद बूंद टपके पानी नल से दोस्त तब निचे बर्तन रख बचत कर जल खोल नल व्यर्थ ना बहा जब दांडी बने बरसात का पानी का मिजाज बिगड़े तब तबाही आती कैसी कैसी सब जाने संकलित पानी ग्लेशियर में सदियों से गर्मी बड़े तब पिघलते ग्लेशियर संसार में तबाही आती मचे  बर्बादी हर ओर सखी गर्मी कम हो मंदिर मस्जिद नहीं जंगल बना बचे तौ धर्म भी खूब चर्चा होगी फिलहाल पैड लगा अस्तित्व बचा आपना ओर अन्य जीव का  हम तुम मिल कर  गुलशन लगाये बाग वृक्ष ना काटे हरा-भरा कोई...

आप सभी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं*।

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*आप सभी  को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं*। *नारियां शक्तियां हैं शक्तियां नारियां* *हैं परम ब्रह्म की मधुमयी शक्तियां*। *शक्तियां हैं नारियां, नारियां हैं शक्तियां* *हैं परम ब्रह्म की मधुमयी शक्तियां* *खुद जगें और सबको जगाती चलें,* *तम मिटाती चलें पथ बनाती चलें* *रोशनी की हों ज्यों वे लिखी पंक्तियां* *नारियां शक्तियां हैं, हैं शक्तियां नारियां* *हैं परम ब्रह्म की मधुमयी शक्तियां*। *हैं पहुंचने लगीं अब तो आकाश तक*, *जीतती हैं हृदय और विश्वास तक* *हैं चेतना की वे सुंदर सजग लहरियां* *हैं परम ब्रह्म की मधुमयी शक्तियां* *आइए हम सभी साथ मिलकर चलें* *जीतलें हम हृदय हम जिधर भी बढ़ें* *हम सृजनशील हों हम लिखें और पढ़ें* *हम विधाता की हैं दिव्य सी दृष्टियां* *नाम रोशन करें हम मधुमयी शक्तियां* *हैं नारियां शक्तियां, शक्तियां हैं नारियां* *हैं परम ब्रह्म की मधुमयी शक्तियां* *हर अंधेरा मिटे और सवेरा बढ़े* *रात गहरी न हो दिन सदा ही चढ़े* *हाथ में खड्ग लें देवी दुर्गा बने* *हो जरुरत जहां चंडिका बन लड़ें* *सृष्टि की मूल ये ब्रह्म की शक्तियां* *हैं नारियां शक्तियां शक...

शक्ति हूं मैं नारी हूं*

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*सभी नारियों को सादर सप्रेम समर्पित* *शक्ति हूं मैं नारी हूं* नहीं अबला न ही बेचारी हूं। बरगलाओ न मुझे मैं पहचानती हूं अपनी शक्ति को जानती हूं। न जकड़ो मुझे मिथ्या आडंबरों में मैं परमात्म की अनुपम कृति उसी की  शक्ति बसती है मेरे स्वरों में। मैंअंश हूं उस अंशी का जिसने रची है समूची सृष्टि ,उसी परमात्म के दिव्य आलोक से आलोकित है    मेरा मन, नहीं शामिल मैं लोभियों, पाखंडियों और पामरों में। क्योंकि मानवी हूं मैं चिर मानवता ही मेरा सजीला ख्वाब। समझो न मुझको भार,ईश का वरदान हूं नायाब।। समझो नहीं भार हूं मैं शक्ति हूं सिरजनहार हूं मैं। अपनी आभा से प्रकाशित कर रही हूं विश्व सारा। मधुमयी हूं  प्रेम से  बढ़ती ‌सदा ही भेदती हूं मैं सदा ही नफरतों की सघन कारा।       डॉ मधु पाठक ,राजा श्रीकृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय जौनपुर उत्तर प्रदेश।

नारी को अधिकार मिले

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नारी को अधिकार मिले जब से नारी को नारी का, सम्बल मिलना शुरु हुआ। वसुधा से उठकर नारी ने, हाथों से आकाश छुआ।। पग - बाधा बनकर नारी ने, नारी को  अक्सर  रोका। नारी ने इतिहास रचाया, जब भी उसे मिला मौका।। आँख खोलकर देख पाँव अंगद- सा जमां जमीं पर है। और  हाथ  में  सीढ़ी अथवा, सीढ़ी ही  दोनों  कर है।। धरती से अम्बर तक नारी, अथवा जग नारीमय है। अवध नारियों से ही उन्नत,नर - नारी है, किसलय है।। इसीलिए अब से नारी को, नारी का अधिकार मिले। पतझड़ से व्याकुल उपवन को, पावस का उपहार मिले।। मानवता के लिए स्वयं का, अहंकार अर्पण कर दें। पौरुष के शुभ नवाचार को, मनुज हेतु दर्पण कर दें।।    डॉ. अवधेश कुमार अवध मेघालय 8787573644

महिला दिन पर खास महिला की पीड़ा

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औरत जो  प्रवस पीड़ा सहने उसे कैसे पुकारा अबला जो मनुष्य का पहला गुरु उसे कैसे पुकारा मंदबुद्धि पन्ना धाय तुच्छ पद पर कर रहे कर रच गई इतिहास बुध्दि पर उसके मान करें इतिहास  दो बारात आ गई एक राजकुमारी की जान दे अपनी मीरा की बहन ने लोगों युद्ध रोका पढ़ लो इतिहास को दोस्तों जान ले नहीं सकती तो जान दे कर किया कमाल खिलजी से युद्ध हुआ राजा  हाय हारा रानी पद्मावती ने जोहर कर शुन्य करी दुश्मन की जीत को सब जाने जोहर औरत जान ले नहीं सकती दे कर जोहर करें जान लेने में रही कई औरतें माहिर रानी लक्ष्मीबाई बाई या हो रजिया जीजा बाई की शिक्षा से बने शिवाजी शबरी ने जुटे बैर खिला राम का प्यार मान पायै क्या नहीं पाया शबरी ने लोगों औरत जान ले नहीं सकती दे सकती कोई आख बांध समय की रीत निभाये कुछ औरतें बुरी कहलाती मंथरा दासी शुपडखां भी उनमें से कुछ नाम है यार पुतली बाई फूलन देवी डाकू बन बैठी दुसरी ओर मीरा ने भजन लिखे अनमोल सुनो सुभद्रा कुमारी चौहान ने किया कलम से कमाल वर्तमान में अब झांके हम अपने लोगों कल्पना चावला ने अंतरिक्ष में कमाल की बुद्धि रख  चकित हुआ सारा विश्व इंदिरा गांधी प्रधानमंत्...