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रास्ते फिसल रहे हैं : चिन्ता से चिन्तन तक

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रास्ते फिसल रहे हैं : चिन्ता से चिन्तन तक                      डॉ अवधेश कुमार अवध रास्ते फिसल रहे हैं। प्रतिस्पर्धा पर संघर्ष की जीत के लिए फिसल रहे हैं। ये यकायक नहीं फिसलने लगे। पहले भी फिसलते थे। युगों से फिसल रहे हैं। वर्षों से फिसल रहे हैं। अब पहले से तेज फिसल रहे हैं। समय से आगे निकलने की होड़ में फिसल रहे हैं। बस मैंने पहले सोचा नहीं था। कुछ सोचा भी था। राही की तरह सोचा था। असोचन की मुद्रा में सोचा था। ठीक से नहीं सोचा था। रास्ते की तरह नहीं सोचा था। मजदूर की तरह नहीं सोचा था। मजबूर की तरह भी नहीं। नहीं सोचा था किसान की तरह भी। रास्ते पर फिसलते राही की तरह नहीं सोचा था।  कवि बनकर नहीं सोचा था। लेखक के नजरिये से नहीं सोचा था। उमेश प्रसाद सिंह के हृदय से नहीं सोचा था। सोच भी नहीं सकता। कभी भी नहीं। कदापि नहीं। ललित निबंध के सशक्त हस्ताक्षर डॉ उमेश प्रसाद सिंह "रास्ते फिसल रहे हैं" में बहुतों को फिसलते देखे हैं। कइयों की नज़रों से अलग-अलग देखे हैं। शिवजी के धनुष को टूटते देखे हैं। डिप्टी साहब, हेडमास्टर, मास्टर और बच्चों की न...