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नव वर्ष पररचनाएँ

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ऐसे करे नव वर्ष का स्वागत :::::::::::::::::::::::::::::::::::;:::; निकलने वाला प्रत्येक दिन बीतता हैं और बीतते दिनों के साथ महीने और साल भी बीत जाता हैं |इसीतरह यह साल भी बीत रहाँ हैं क्या बीत गया कहना ही उचित होगा क्यों कि यह अंतिम सप्ताह हैं |इस साल का और यह भी जाने वाला हैं क्यों कि समय किसीके लिए रुकता नही तो यह दिन , महीने और साल कैसे रुक सकते हैं |         यह साल बहुत ही दर्दनाक रहाँ कोरोना जैसी आपदा से सारे विश्व को लढना पड़ा इस दौर में बहुत ही अच्छी - अच्छी हस्तियों को हमे खोना पड़ा किसी परिवार का सहारा चला गया तो , किसी के सिर से ममता का आँचल तो किसी के माँग का सिंदूर तो किसी के घर का चाँद तो किसीके दिल का बहार चला गया मगर यह साल हमे एक सिख दे गया कि वक्त कैसा ही क्यों ना हो वह बीत जाता हैं  सिर्फ हमे सब्र के साथ खुद में एक सकारात्मक सोच बनाए रखनी चाहिए | यह सिख हमारे जीवन मे हर पल एक मार्गशक के रूप में रहेगी और रहेगी भी इसी तरहाँ यह साल कुछ खटा - मिट्ठा रहाँ और अब हमारे बिछ से भी विदा हो रहाँ हैं  |           मेर...

मन्नू भंडारी जी को श्रद्धांजलि

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                                मन्नू भंडारी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि                💐💐💐💐                                      हिंदी साहित्य जगत में बहुत से कालजयी रचनाएँ हैं | उनमें आपका बंटी यह कृति आज वर्तमान में आधुनिकता कारण हो रहे परिवार विघटन का चित्रण करने वाली कृति हैं | माता का घर मे झगड़ा , तनाव और इसका बच्चों पर होने वाला परिणाम आज भी यह समस्या बड़े पैमाने में देखने को मिलती हैं |           कोई भी साहित्यिक कृति किसी भी काल मे प्रासंगिक लगती हैं तो मुझें लगता हैं कि वह कृतिकार ही कालजयी हैं रचना नही ऐसी बात मन्नू  भंडारी जी पर बैठ सकती हैं क्यों कि उन्होंने तत्कालीन समय लिखा साहित्य आज हम पढ़ते हैं तो लगता हैं कि यह तो आज का चित्रण हैं | मेरे पड़ोस का ही नायक हैं इतना ही नही तो कही कहि लगता हैं कि अरे यह तो मेरा आज ...

दीपावली पर हिंदी रचनाएँ

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।।दिया जलाओं तम हटाओं।। दिया जलाओं तम हटाओं, रौशनी घर घर फैलाओं। गमों का अंधेरा रह न जाए, खुशियों का पहरा लगाओं। झाँक लेना घर भी उनके,मिट्टी को आकार जो देतें, सपने उनके मिट्टी से हैं मिट्टी में दुनिया बसे । घर हमारे दीप जलें जो उनकी मेहनत से ही आतें, हम सजाएं दीपमाला चेहरे उनके खिल जाते। चीनी सामानों को छोड़ों मिट्टी के दीये जलाओं, संग कुम्हारों के भी अपने त्योहारों की खुशी मनाओं। चेहरे को मिल जाए सुकून कांपते हाथों को बल , कमजोर जो आर्थिक रूप से हम भी बने उनके संबल । दीपों कि माला सजाओं, रौशनी दरबार लगाओं रोते आँसु को हंसाओं रागिनी दिप राग सुनाओं। दीपावली के पावन पर्व पर खुशियाँ मनाएं भरपूर हम, महलों की रौनक हो कुटिया, में आओं आज मिटाएं तम। दिया जलाओं तम हटाओं, रौशनी घर घर फैलाओं, गमों का अंधेरा रह न जाए, खुशियों का पहरा लगाओं। बबिता अग्रवाल कँवल सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल ---------------- -------- -- ---- -------------------/---------      दीपाली दिप ना ईद चांद बिना होली नही है रंग बिना  दिवाली दीप बिना जीवन ना पूर्ण संत बिना  मिलाये ईद बिन...

स्त्री-पुरूष समता (जेंडर इक्वॅलिटी- लैंगिक समानता) आखीर कहें किसे?

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स्त्री-पुरूष समता (जेंडर इक्वॅलिटी- लैंगिक समानता) आखीर कहें किसे?        भारतीय संविधान, कलम १४,१५ के तहत भारतवासियों को समता का अधिकार देता है। और इसके तहत "धर्म, वंश,जात,लिंग और प्रांत के आधार पर सरकार या किसी भी व्यक्ती के द्वारा देशवासियों के साथ कोई भी गैर सलूक (भेदभाव) नहीं किया जा सकता। या इस तरह के असमानता पूर्ण रवैये को संवैधानिक तौर पर अनुमती नहीं देता। कलम १५-(१) और (२) के तहत धर्म, वंश, जात, लिंग और प्रांत इनमें से किसी भी एक या अनेक कारणवश, कहीं भी चाहे वह सार्वजनिक स्थल (दुकान, हाॅटेल, बाग, रस्ते, तालाब, कुआॅ इत्यादी) हो, या किसी की स्वयं की खरिदी हुई व्यक्तिगत जगह पर आना, जाना, इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध  नहीं किया जा सकता। और यही आर्टिकल १५(३)महिला और बालकोंके हित के लिए विशेष कानुनी व्यवस्था करने का   हर राज्य को विशेषाधिकार भी प्रदान करती है। चाहे वह शिक्षा हो, नोकरी हो, या  विशेष कानुनी संरक्षण हो। जेंडर इक्वलिटी ,लैंगिक समता जिसे हम स्त्री-पुरुष समानता भी कहते है, यह हमे दो स्तर पर देखने को मिलती है। एक संवैधानिक स्...

प्रेमचंद पर कविता जीवनी

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जीवनी ==================== उंगलियाँ हर किसी पर ऐसे ना उठाया करो , उठाने से पहले खुद कुछ कमाया करो  | मुझें तो हर जीव में भीतर एक भोला इंसान दिखता हैं , मुंशी प्रेमचंद का एक सचमुच बृहद एक कथा संसार सा दिखता हैं | मंदिर में दान खाकर , चिड़िया मस्जिद में पानी पीती हैं , और था एक प्रेमचंद जो बच्चों को इदगाह सुनता था | कभी श्री कृष्ण , की लीला गाता, तो कभी रसखान सुनता था | बाकियों को दिखते होंगे हिन्दू और मुसलमान , मुझें तो हर जीव में भीतर एक भोला इंसान दिखता हैं | उंगलियाँ हर किसी पर ऐसे ना उठाया करो , उठाने से पहले खुद कुछ कमाया करो |                                       कवयित्री         सुगंधा राजुलाल चाबुकसवार

प्रेमचंद होने का मतलब

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प्रेमचंद होने का मतलब प्रेमचंद होने का मतलब स्वयं हर पात्रों को जीना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब गुलामी में भी स्वाभिमान के साथ आजादी के भावरस को छीनकर छककर पीना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब जनपद के शोषक डिप्टी कलक्टर के आगे गर्व से शोषित घर का कलक्टर होकर अड़ जाना  होता है। प्रेमचंद होने का मलतब जेल की परवाह किए बगैर शोषक के विरुद्ध क्रान्ति की मशाल लेकर आगे बढ़ना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब आवश्यकतानुसार नाम और भाषा बदलकर भी पहचान न खोना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब हर तरह की सामाजिक असमानता और सांस्कृतिक पिछड़ेपन को मुखर स्वर देना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को आत्मसात करना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब देश के प्रति भूख प्यास भूल जाना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब गोदान हो जाना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब कीचड़ में होने पर भी पंकज हो जाना भी होता है।  डॉ अवधेश कुमार अवध मेघालय 8787573644

कुशवाहा कान्त : एक जासूस की मौत - मिस्ट्री

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कुशवाहा कान्त : एक जासूस की मौत - मिस्ट्री           डॉ. अवधेश कुमार 'अवध' साहित्यिक उपज की दृष्टि से काशी प्राचीन काल से उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक उर्वर भूमि है। इस भूमि पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साहित्यिक मशाल को प्रसाद, प्रेमचंद और रामचन्द्र शुक्ल के साथ ही जलाए रखा एक चिर युवा साहित्यकार ने जिसका जन्म काशी के निकट मिर्जापुर में हुआ था किन्तु कर्मस्थली पावन काशी रही। अंग्रेजों की हुकूमत में जनमानस गुलामी के कारण पहले से ही सहमा हुआ था और ऊपर से दिसम्बर की हाड़ कपकपाने वाली शीतलहर का प्रकोप। 9 दिसम्बर सन् 1918 को मिर्जापुर के महुवरिया में बाबू केदारनाथ को एक ऐसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसके बारे में कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह बालक साहित्य को नई दिशा व नया आयाम देगा। जी हाँ, शिशु कुशवाहा कान्त के पाँव पालने में ही तरुणायी का भान कराने लगे थे। उस वक्त देवकी नन्दन खत्री के तिलस्मी उपन्यास का खुमार छाया हुआ था। जब ये नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तो इन्होंने 'खून का प्यासा' जासूसी उपन्यास लिखा। जल्दी ही ये कुँवर कान्ता प्रसाद के नाम से ख्याति अर्जित करने लगे थे...