कृषि संस्कृति का त्यौहार बैल पोला

              

    प्रा मारोती गंगासागरे 
       नांदेड़ महाराष्ट्र से

     वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति के बहुत से महत्वपूर्ण त्यौहार कम होते जा रहे है । खास कर खेती से संबंधित तथा कृषि जीवन से संबंधित त्यौहार लगभग लुप्त हो गए हैं और जो भी मनाए जा रहे है वह भी आधुनिक तरीके से किसान का सबसे नजदीकी साथ उसका बैल होता है । बैल किसान को खेती के हाल जोतना , बुआई करना तथा बुआई के लिए खेती तैयार करने के कामों में बैलो को महत्वपूर्ण भूमिका होती है । इन्हीं बैलों के लिए किसान का महत्त्व पूर्ण त्यौहार जो कि सावन महीने का अंतिम दिन होता है । उसे पोला कहा जाता है । इस त्यौहार को विभिन्न राज्यों विभिन्न नामों से जाना जाता है । 
       किसान का सच्चा साथी बैल होता है और इन बैलों के महत्व को मानने के लिए तथा खेती में किसान के साथ मेहनत करने वाले बैलों को पूजने के लिए तथा वह भी पूजने योग्य है और इन्हें केवल एक प्राणी नहीं बल्कि किसान के जीवन का अविभाज्य अंग है । और इन्हें भी पूजना चाहिए इसी उद्देश्य से भारतीय संस्कृति में यह बैलों का त्यौहार मनाने की परंपरा आरंभ की हो और इसी परंपरा को आगे बढ़ाते - बढ़ाते वह परंपरा त्यौहार में परिवर्तित हो गई हो । यह त्यौहार महिलाओं का , पुरुषों का न होकर यह त्यौहार समग्र भारतीय किसान संस्कृति का है । इस अवसर पर किसानों का बैलों के प्रति प्रेम और बैलों का भी पूरे किसान परिवार के साथ लगाव यही प्रस्तुत करता है । इस त्यौहार में खेती में उपयोग आने वाले सभी अवजारों की पूजा की जाती है , खेत के आस - पास के सभी देवी - देवताओं को नारियल फोड़कर पूजा की जाती है । शायद देवताओं को बैलों को अच्छा आरोग्य मिले इस लिए प्रार्थना करते होंगे । इतना ही नहीं किसानों के घर की साफ - सफाई करके दीवारे गेरु से रंगाई जाती है । और इस दिन सुबह से किसान का सारे परिवार के सदस्य व्यस्त रहते है । 
      सभी विश्व को अन्न देने वाला किसान ही नहीं बैल भी होता है । यह बात हम धीरे - धीरे भूल जा रहे है और आधुनिकता की भरमार के कारण बैल यह लुप्त होते जा रहे है । और बैलों के स्थान पर ट्रैक्टर आ रहे है और यह बैलों का त्यौहार वर्तमान में लुप्त होता जा रहा है । भारतीय संस्कृति में पोला यह महत्वपूर्ण त्यौहार है । खास करके यह किसान संस्कृति का त्यौहार है मगर आधुनिक युग में सब खेती काम मशीनों से हो रहा है और दिनों - दिन बैलों की संख्या कम  होती जा रही है । मुझे लगता है कि धीरे -  धीरे यह त्यौहार और बैल लुप्त न हो जाए और बैलों का त्यौहार सिर्फ इतिहास में समा न जाए । 
    पहले के समय में गाँव में बारिश के दिनों में बैलों को अच्छा और हरा घास खिलाकर उनकी अच्छी देख-भाल करके उनकी तबियत बनाई जाती थी । इसके पीछे कारण था कि पोले अवसर गाँव के सभी बैल मारुति मंदिर के सामने , सजाकर लाए जाते थे , मंगल अष्टक गाकर उनपर अक्षदा सारा गाँव डालता था । इस में हमारे बैल सबसे अच्छे दिखे यह सोच सभी किसानों की होती थी । फिर मारुति मंदिर की बैलों के साथ किसान पाँच प्रदक्षिणा लेता है । फिर घर लाकर भी बैलों की और खेती के सभी अवजारों की पूजा होती थी । फिर बैलों को पूरन पोली का नैवेद्य खिलाया जाता था । इस दिन किसान दिन भर  उपवास रखता था ।
      वर्तमान में यह त्यौहार और बैल लुप्त हो जा रहे है और इसके साथ ही कृषक संस्कृति भी लुप्त हो रही है ।

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