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स्त्री-पुरूष समता (जेंडर इक्वॅलिटी- लैंगिक समानता) आखीर कहें किसे?

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स्त्री-पुरूष समता (जेंडर इक्वॅलिटी- लैंगिक समानता) आखीर कहें किसे?        भारतीय संविधान, कलम १४,१५ के तहत भारतवासियों को समता का अधिकार देता है। और इसके तहत "धर्म, वंश,जात,लिंग और प्रांत के आधार पर सरकार या किसी भी व्यक्ती के द्वारा देशवासियों के साथ कोई भी गैर सलूक (भेदभाव) नहीं किया जा सकता। या इस तरह के असमानता पूर्ण रवैये को संवैधानिक तौर पर अनुमती नहीं देता। कलम १५-(१) और (२) के तहत धर्म, वंश, जात, लिंग और प्रांत इनमें से किसी भी एक या अनेक कारणवश, कहीं भी चाहे वह सार्वजनिक स्थल (दुकान, हाॅटेल, बाग, रस्ते, तालाब, कुआॅ इत्यादी) हो, या किसी की स्वयं की खरिदी हुई व्यक्तिगत जगह पर आना, जाना, इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध  नहीं किया जा सकता। और यही आर्टिकल १५(३)महिला और बालकोंके हित के लिए विशेष कानुनी व्यवस्था करने का   हर राज्य को विशेषाधिकार भी प्रदान करती है। चाहे वह शिक्षा हो, नोकरी हो, या  विशेष कानुनी संरक्षण हो। जेंडर इक्वलिटी ,लैंगिक समता जिसे हम स्त्री-पुरुष समानता भी कहते है, यह हमे दो स्तर पर देखने को मिलती है। एक संवैधानिक स्...

प्रेमचंद पर कविता जीवनी

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जीवनी ==================== उंगलियाँ हर किसी पर ऐसे ना उठाया करो , उठाने से पहले खुद कुछ कमाया करो  | मुझें तो हर जीव में भीतर एक भोला इंसान दिखता हैं , मुंशी प्रेमचंद का एक सचमुच बृहद एक कथा संसार सा दिखता हैं | मंदिर में दान खाकर , चिड़िया मस्जिद में पानी पीती हैं , और था एक प्रेमचंद जो बच्चों को इदगाह सुनता था | कभी श्री कृष्ण , की लीला गाता, तो कभी रसखान सुनता था | बाकियों को दिखते होंगे हिन्दू और मुसलमान , मुझें तो हर जीव में भीतर एक भोला इंसान दिखता हैं | उंगलियाँ हर किसी पर ऐसे ना उठाया करो , उठाने से पहले खुद कुछ कमाया करो |                                       कवयित्री         सुगंधा राजुलाल चाबुकसवार

प्रेमचंद होने का मतलब

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प्रेमचंद होने का मतलब प्रेमचंद होने का मतलब स्वयं हर पात्रों को जीना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब गुलामी में भी स्वाभिमान के साथ आजादी के भावरस को छीनकर छककर पीना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब जनपद के शोषक डिप्टी कलक्टर के आगे गर्व से शोषित घर का कलक्टर होकर अड़ जाना  होता है। प्रेमचंद होने का मलतब जेल की परवाह किए बगैर शोषक के विरुद्ध क्रान्ति की मशाल लेकर आगे बढ़ना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब आवश्यकतानुसार नाम और भाषा बदलकर भी पहचान न खोना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब हर तरह की सामाजिक असमानता और सांस्कृतिक पिछड़ेपन को मुखर स्वर देना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को आत्मसात करना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब देश के प्रति भूख प्यास भूल जाना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब गोदान हो जाना होता है। प्रेमचंद होने का मतलब कीचड़ में होने पर भी पंकज हो जाना भी होता है।  डॉ अवधेश कुमार अवध मेघालय 8787573644

कुशवाहा कान्त : एक जासूस की मौत - मिस्ट्री

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कुशवाहा कान्त : एक जासूस की मौत - मिस्ट्री           डॉ. अवधेश कुमार 'अवध' साहित्यिक उपज की दृष्टि से काशी प्राचीन काल से उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक उर्वर भूमि है। इस भूमि पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साहित्यिक मशाल को प्रसाद, प्रेमचंद और रामचन्द्र शुक्ल के साथ ही जलाए रखा एक चिर युवा साहित्यकार ने जिसका जन्म काशी के निकट मिर्जापुर में हुआ था किन्तु कर्मस्थली पावन काशी रही। अंग्रेजों की हुकूमत में जनमानस गुलामी के कारण पहले से ही सहमा हुआ था और ऊपर से दिसम्बर की हाड़ कपकपाने वाली शीतलहर का प्रकोप। 9 दिसम्बर सन् 1918 को मिर्जापुर के महुवरिया में बाबू केदारनाथ को एक ऐसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसके बारे में कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह बालक साहित्य को नई दिशा व नया आयाम देगा। जी हाँ, शिशु कुशवाहा कान्त के पाँव पालने में ही तरुणायी का भान कराने लगे थे। उस वक्त देवकी नन्दन खत्री के तिलस्मी उपन्यास का खुमार छाया हुआ था। जब ये नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तो इन्होंने 'खून का प्यासा' जासूसी उपन्यास लिखा। जल्दी ही ये कुँवर कान्ता प्रसाद के नाम से ख्याति अर्जित करने लगे थे...

पर्यावरण

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पर्यावरण तरुवर अति पावन,बहुत सुहावन,यह बहु बिधि सुखकारी l कुछ पौध लगाओ,रोग भगाओ,हो विकसित फुलवारी ll छाया मन भाये,मेघ बनाये,हर्षित नर अरु नारी l धरती मुसकाती,कोयल गाती,फल से नत तरु भारी ll आक्सीजन दाता,नेह लुटाता,वृक्ष देव कहलाते l हम पूजें इनको,रजनी दिन को,रक्षा तिलक लगाते ll दीनों की आशा,जन्तु निवासा,राहगीर पुनि आते l ये   रैन   बसेरा, सबका  डेरा,पा आश्रय  हरषाते ll ये भगवन दूजा,कर लो पूजा,पर्यावरण सुधारो l कर  इनकी सेवा,पाओ मेवा,इन पर निज को वारो ll ऋगुवेद   सुनावे,जन   जन गावे,दस  पुत्रों सम धारो l यह कर्म पुनीता,वेद सुनीता,जीवन जन्म सँवारो ll डॉ अवधेश कुमार 'अवध' 8787573644

रिश्तें निभाने हैं तो सिखों इन चीजों को

          रिश्तें निभाने हैं तो सिखों इन चीजों को :::::::::::::::::::::::::::::: :::::::::::::::::::::::::::::: :::::::::::::::              आज जो भी अपने रिश्तें को , रिलेशनशिप को बेहतर बनाना चाहता हैं | चाहें वह लड़का हो या लड़की , महिला हो या पुरुष किसी भी उर्म का शख्स निम्नलिखित बातों को ध्यान से पढ़कर अपने रिश्तें में  अप्लाई करता हैं तो वह रिश्तेदारी का सम्राट बन जाएगा |               मनुष्य जीवन में  रिश्तों को काफी अहमियत हैं | क्यों कि हर इंसान का व्यवहार , बर्ताव तथा सामाजिक दायरा यह सब रिश्तेंदार तथा समाज के लोग तय करते हैं | प्रत्येक इंसान अपनी जिंदगी में कितने रिश्तें बनाता हैं , तोड़ता हैं | सुना हैं कि रिश्तेंदारी की दुनियाँ जिसने सीखी उसने तो जिंदगी सीखी | आज- कल कॉलेज लाईफ में न जाने कितने दोस्त मिलते हैं , कितने रिश्तें बनते हैं | मगर उसे निभाना हर किसी को कहाँ आता हैं | उदाहरण कहाँ जाएँ तो एक छोटीसी स्टेपलर पिन अनेक कागजो को एकत्रित , सभी ...

श्रद्धेय विनायक दामोदर सावरकर

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श्रद्धेय विनायक दामोदर सावरकर यह एक व्यक्ति मात्र नहीं, एक संस्था मात्र नहीं अपितु एक अक्षय विचारधारा का नाम है। वह विचारधारा जो गुलामी की स्याह कारा में रहकर भी आजादी का लौ जला सकती है। वह विचारधारा को गुरुगोविन्द सिंह की तरह अपने समस्त परिजनों को बलिवेदी के निमित्त न्यौछावर कर सकती है। वह विचारधारा जो उस भविष्य के चलचित्र को देख सकती है जिसे जनसाधारण की नंगी आँखें कभी देख नहीं पातीं। विश्वविद्यालयी डिग्रियों से निर्मित विवेक कभी समझ नहीं पाते।  वीर सावरकर का सबसे स्तुत्य कार्य रहा 1857 के संग्राम को *प्रथम स्वातन्त्र्य समर* नाम देना। यह दुनिया की वह पुस्तक है जो छपने से पहले ही प्रतिबंधित कर दी गई थी। यह जलवा रहा सावरकर जी की लेखनी का। आज यह पुस्तक विश्व की कई भाषाओं में उपलब्ध है जबकि प्रकाशन के समय समस्त ब्रितानी हुकूमत ने समस्त अंग्रेजी, हिंदी और मराठी प्रेसों को बंद करा दिया था। लाल लट्टुओं का मानना था कि सावरकर जी कि पुस्तक इन तीन भाषाओं में ही निकल सकती है। हकीकत यह है कि उस समय के तमाम क्रान्तिकारियों ने अलग अलग भाषाओं में अनुवाद करके प्रकाशन का बीड़ा उठा लिया था।  इस ...