कलुवा की गुड़िया"
कहानी= ="कलुवा की गुड़िया"=
कस्तूरी ने बड़े ही बुझे मन से अपने हलक से दो=चार कोर उतारे और हाथ धो, पानी पीकर अपनी लुगड़ी (साड़ी )के पल्लू से हाथ पोछ झोली में सो रहे अपने 3 वर्षीय बेटे कलुवा के पास आ एक बार फिर उसके गाल को हल्के से छुआ ।अब बुखार कुछ कम हो गया था ।उसकी लड़की कमली अपने पिता रेवाराम के साथ रोटी खाकर अपने छोटे भाई कलुआ को झोली में सुलाते =सुलाते खुद जमीन पर ही सो गई थी और आज सुबह कमली को कलवा का ध्यान रखने का कहकर वह खुद दाडकी (मजदूरी )के लिए चली गई थी ।अब उसे छबड़ी (टोकरी) उठा फेरा लगाने जाना था उसका पति रोज सूरज सिर चढ़े ही उठता और मन होता तो अपने सुतारी के काम में लग जाता। इसके बाद उसे दिन में 10 बार चाय चाहिए और मुंह में बीडी भले ही दिन में खाना मिले या ना मिले लेकिन रात को थकान मिटाने के लिए दारु जरूरी थी।
शहर के पास बसे इस छोटे से गांव नुमां कस्बे में रेवाराम कोई 8 बरस पहले कस्तूरी को ब्याह कर लाया था। कस्तूरी ने यही तीन संतानों को जन्म दिया था जिनमें सबसे बड़ी लड़की कमली दूसरा सूरज जो कुपोषण का शिकार होकर छुटपन में ही चल बसा था, तीसरा कलवा जो पिछले चार-पांच दिन से तेज बुखार की चपेट में पडा था और चौथा कस्तूरी की कोख में पनप रहा था। कमली के पैदा होने तक तो रेवाराम बड़ा मेहनती और खुशमिजाज था और वह दारू आदी व्यसनों से भी दूर ही था। दारु पीना तो उसने कलुवा के पैदा होने के बाद शुरू किया था ।इसके साथ ही साथ वह अपनी जवाबदारीयो से भी लापरवाह होने लगा था ।दारू पीकर नशे की पिनक में अक्सर बड़बड़ा करता "अरे बेटा आ गया है बेटा ,फिर क्या चिंता करना ?अपना बुढ़ापा वही संभाल लेगा"
रेवाराम का यही एकतरफा सोच धीरे-धीरे उसे आलसी और निकम्मा बनाने लगा ।उसने दाडकी जाना भी बंद कर दिया और उस कस्बे के कुछ पुराने चिलमचीयो में उठने= बैठने लगा। विवश होकर बेचारी कस्तूरी को अपना और अपने बच्चों का पेट पालने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा कहते हैं कि "डूबते को तिनके का सहारा" लेकिन आदमी का जीवन कोई कहावत नहीं बल्कि वास्तविकता के ठोस धरातल पर एक कड़वा सच है प्रश्नवाचक चिन्ह लिए ,सो कस्तूरी की जी तोड़ मेहनत के बावजूद गरीबी जस की तस बनी रही ।आखिर गृह कलह से तंग आकर रेवाराम को अपना पुश्तैनी धंधा सुतारी का काम शुरू करना ही पड़ा। हालात कुछ सुधरे मगर रेवाराम के चिड़चिडेपन और आलस के कारण यदा-कदा ही कोई उसके पास अपना काम कराने आता ।एक तो वह काम काम और बीड़ी ज्यादा फूकता था दूसरा यह कि काम भी वह ढंग से नहीं करता था ।
उस दिन भी वह अपने सुतारी के औजारों और लकड़ी के बुरादे से घिरा दीवार से पीठ टिकाए बीड़ी फूँक रहा था कि कस्तूरी जामुन से भरी टोकरी उठाएं आंगन में आकर रेवाराम से बोली=" कलुवा सो रहा है। उठ जाए तो कमली से कह कर उसे दवा दिलवा देना बीड़ी ही फूँकते मत बैठे रहना ।मै नई कॉलोनी में फेरा लगाने जा रही हूं।
" रेवाराम लापरवाह बना सुनता रहा तो कस्तूरी फिर बोली=" डॉक्टर की पर्ची दे दो ,गोलिया भी लेती आऊंगी"
रेवाराम ने बुझी हुई बीडी को फेंक कर दीवार पर टंगे पजामे की जेब से बीड़ी के बंडल से दूसरी बीड़ी निकाल हौठो में दबा ली और पर्ची ढूंढने लगा ।इस पर कस्तूरी हिकारत से बोल पड़ी ="अपने ऐशमोज के लिए तुम्हारे पास पैसे हैं कलुवा को गुड़िया लाकर देने के लिए नहीं ,मैं कहूं 2= 4 दिन दारु मत पीते और उस बेचारे के लिए एक अच्छी सी गुड़िया ही ला देते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता"
"चल चल, बातें मत बना। तेरे बाप ने धन गाड के रखा है यहां ,जो ले आऊ ।उस दिन लाया तो था पर तेरे लाटसाहब को तो वह टीवी वाली गुड़िया ही चाहिए ।ला दे 200 रुपया अभी जाकर ले आता हूं "।रेवाराम ने दवा की पर्ची कस्तूरी की तरफ फेंकते हुए कहा।
कस्तूरी बिना कुछ कहे पर्ची लेकर चल पड़ी थी। भर दोपहरी, पति का उलहाना, कलुवा की चिंता और सिर पर जामुूनो की भरी टोकरी का बोझ उठाए वह कॉलोनी की हर गली में चिल्ला चिल्ला कर अपने जामुन बेच रही थी ="जामुन ले लो जामुन, मीठे मीठे रसीले जामुन"
महीना भर पहले कस्बे में ईट भट्टे का ठेकेदार बनवारी बड़ा रंगीन टेलीविजन लाया तो आस-पड़ोस के लोगों की भीड़ उसी के यहां टीवी देखने के लिए जमा होने लगी थी। पिछले रविवार की ही तो बात है "आई लव यू रसना "की मधुर आवाज कानों में पड़ते ही कमली भी कलुवा को अपनी पीठ पर तोक कर बनवारी काका के आंगन में टीवी के सामने जा खड़ी हुई। बस इतना ही कसूर था बेचारी कमली का। ना उस दिन वह कलुवा को वहां ले जाती और ना कलुवा रेशमी बालों वाली गुड़िया लेने की जिद करता। उस रोज शाम तक कलवा गुड़िया के लिए रोता रहा तो रेवाराम ने पँसारी की दुकान से पीपी बोलने वाली एक छोटी सी गुड़िया ला दी ।गुड़िया देख कर कलुवा खुश हुआ। उसने गुड़िया को दबाकर पीपी भीध किया किंतु दूसरे ही पल गुड़िया फेंक कर ठिसकते हुए रुँआसे स्वर में बोला ="ये नी, टीवी वाली चाहिए।"
रेवाराम को एकदम गुस्सा आ गया।एक् झन्नाटेदार चांटा कलुवा के गाल पर जड़ दिया ।चांटा इतना जबरदस्त था कि मासूम कलवा दर्द से बिलबिला कर गिर पड़ा और रोते-रोते एक कोने में दुबक कर दर्द और भय से आंतकीत हो सिसकने लगा।कमली भी डर के मारे दरवाजे की आड़ में छुप कर खड़ी हो गई। रोटियां धेपती थकी हारी कस्तूरी ने यह सब देखा तो उससे रहा ना गया। वह अपने पति रेवाराम पर बिगड़ पड़ी। ="बाप हो या कसाई, क्या मारोगे मेरे छोरे को?" कह कलवा को अपनी छाती से लगाकर बड़बडाने लगी=" काम का ना काज का, दुश्मन अनाज का। रोज पीकर नाटक करता है दारू कुट्टा, अरे गुड़िया ही फेंकी कोई नाक तो नीची नहीं कर दी"।
रेवाराम नशे मे था।एकदम भड़क उठा भद्दीसी गालियां और 4=6 लात घूँसे कस्तूरी को जमाने के बाद लड़खड़ाते हुए बोला=" साली, अपने मुंह की रोटी देता हूं फिर भी दारू कुट्टा बोलती हे। क्या तेरे बाप के पैसों की पीता हूं ।दिन रात हड्डियां तोड़ता हूँ, तब जाकर थोड़ी सी दारू पीता हूं तो तेरी आंखों में आता है। पिटकुट कर कस्तूरी ने रोटियां बनाई और सबको खिला कर खुद भूखी रह दोनों बच्चों को लेकर सो गई। यूं तो कस्तूरी ने कई बार उलहानो और तानों से रेवाराम को जख्मी किया था किंतु इस बार उसे पता ना था कि रेवाराम इतना बिगड़ जाएगा और उसकी इस तरह पिटाई कर देगा। दरअसल उस दिन बहुत दिनों बाद रेवाराम ने एक पिता की जिम्मेदारी को महसूस किया था और उसका निर्वाह करते हुए उसने एक पाव दारू की जगह आज आधा पाव पीकर ही संतोष कर के बाकी बचे पैसों से अपने इकलौते बेटे के लिए छोटी ही सही पर बड़े गर्व और प्यार से पीपी की आवाज करने वाली एक गुड़िया खरीदी थी। लेकिन नादान कलुवा ने उस गुडिया को नापसंद करके रेवाराम का तिरस्कार ही नहीं किया बल्कि उसके आंतरिक स्नेह को भी ठेस पहुंचाई थी।
मानव जीवन खटास और मिठास दुख और सुख का विचित्र संयोग है जिसे न केवल भोगना ही होता है बल्कि समय की धारा में बहते हुए अंतिम पड़ाव तक सहना भी पड़ता है। किंतु मासूम बचपना इससे अनभिज्ञ सिर्फ मनचाहा पाने की ललक से सराबोर होकर हट और अठखेलियां करता रहता है और फिर बालहट की तो बात ही निराली हे। कलुवा भी इसका अपवाद नहीं था। उसके बाल सुलभ मन में तो बस टीवी वाली रेशमी बालों वाली गुड़िया ही बसी थी। जिसे उसने टीवी के रुपहले पर्दे पर नाचते डोलते देखा था। लेकिन कलुवा को उसकी जगह मिला एक दर्द ,एक घाव जिसने उसके मासूम सपने और मन को टुकड़े-टुकड़े कर बिखेर दिया था ।उस दिन की मार और दहशत ने कलुवा के बाल मन पर एक ना भरने वाला घाव लगा दिया था ।और वह दिन पर दिन आतंक भय और बुखार से पस्त होता चला गया था। वैसे पिछले 3 दिनों से सरकारी अस्पताल की दवा चल रही थी किंतु उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आ रहा था।
क्या प्रेम बिना मन पर लगे तिरस्कार के घाव का उपचार संभव है ?और वह भी एक मासूम बालक के मन पर जो सिर्फ स्नेह और ममता से ही सीँचा जा सकता है।
आषाढ़ की ढलती दोपहरी जोर दिखा रही थी कस्तूरी ज्यादा और ज्यादा पैसे कमाने की धुन में पसीने पसीने होकर कॉलोनी की गलियों में जामुन बेचते हुए भटक रही थी ।जब वह थक गई तो एक दो मंजिला इमारत के सामने वाले छोटे पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ गई। उसने अपना पसीना पोँछते हुए जोर से आवाज लगाई ="लो जामुन लो जामुन, मीठे रसीले जामुन "और फिर अपनी कमर में लटकी कपड़े की छोटी थैली से रेजगारी निकाल कर गिनने लगी =कोई ₹15, 50 पैसे थे जिनमें ₹3 पहले से ही उसके पास थे यानी अब तक कुल ₹12, 50 पैस के ही जामुन बिक सके थे। उसने एक बार फिर पैसों को गिना और जब तसल्ली हो गई कि सचमुच ₹15, 50 पैसे ही हैं तो वह चिंतित हो सोचने लगी पता नहीं कलुवा की दवाइयां ं कितने में आएगी? उसने मन ही मन निश्चय किया =मुझे एक फेरा और लगा देना चाहिए अब तो धूप भी कुछ कम हो गई है।बच्चे अपने घरों से जरूर बाहर निकलेंगे खेलने कूदने के लिए। चलो कहीं ऐसे में देर ना हो जाए फिर दवा की दुकान से कलुवा की दवा भी तो लेनी है।
कस्तूरी अपनी जामुन की टोकरी उठा कर चलने ही वाली थी कि सामने वाली इमारत से साफ-सुथरे दो बच्चे जामुन लेने के लिए उसके पास आए ।कस्तूरी ने देखा छोटे लड़के के हाथ में एक रेशमी बालों वाली गुड़िया है। तुरंत जामुन तोल कर कस्तूरी ने बड़े लड़के से पूछा बेटा यह गुड़िया कितने रुपए की होगी?
तब बड़ा लड़का बोला=" 85 की"
कस्तूरी ने उत्सुकता से पूछा ="यह कितना होवे हे?"
"80 और 5 ,85 रुपए की"= वह लड़का बोला।
तभी छोटा लड़का तपाक से बोला =" चल चल, तुझे नहीं मालूम, सामने वाली आंटी को मम्मी 100 रुपए की बता रही थी।
इसी बात पर उन दोनों बच्चों में कहासुनी हो गई और नौबत झगड़े की आगे उनकी धक्का-मुक्की में कुछ जामुन नीचे गिर गए बड़ा लड़का भाग कर इमारत की सीढ़ियों पर चढ़ गया रोते हुए छोटा लड़का भी उसके पीछे दौड़ा कस्तूरी की आंखें सजल हो गई वह कलुवा का बुखार में तपता हुआ मासूम चेहरा उभर आया। वह फोरन उठ खड़ी हुई ।उस इमारत की ऊपर वाली खिड़की से उन दोनों बच्चों का चीखना =चिल्लाना ,लड़ना =झगड़ना अभी भी सुनाई दे रहा था कि तभी एकाएक कस्तूरी की टोकरी में वही रेशमी बालों वाली गुड़िया आकर गिरी। कस्तूरी ने प्रश्न सूचक दृष्टि से ऊपर खिड़की की ओर निहारा।किंतु अब वहां से स्त्री कंठ से आवाज आ रही थी ="दीपू , चीकू डोंट मेक एन वाइस। चलो अपना =अपना होमवर्क करने बैठो।"
कस्तूरी नासमझ बनी कुछ देर वहां रुक कर उन दोनों बच्चों के नीचे आने की प्रतीक्षा करती रही किंतु जब वहां से कोई भी नहीं आया तो उसने टोकरी में पड़े एक कपड़े से जामुन के साथ गुड़िया को भी ढक लिया और जल्दी से टोकरी सिर पर रख तेज कदमों से आगे बढ़ गई ।हां***, इस बार वह जामुन बेचने के लिए आवाज नहीं लगा रही थी।
कुछ देर पश्चात दवाइयों की दुकान से कलुवा की दवाइयां लेकर अब वह जल्दी-=जल्दी अपने घर की ओर बढ़ रही थी। सूरज लगभग डूब चुका था किंतु क्षितिज पर उजाला फिर भी शेष था।हवा में गर्मी कुछ कम जरूर हो गई थी।कस्तूरी बहुत खुश थी कि अब उसका कलुवा रेशमी बालों वाली गुड़िया देखकर नाच उठेगा।और गुड़िया को उठाए ,आंगन में यहां से वहां दौड़ता फिरेगा। कस्तूरी ने अपने घर की गली में आते ही वहां जमा भीड़ को देखकर किसी अनचाही स्थिति के प्रति संदेह महसूस किया ।अपने घर आंगन में कदम रखते ही उसे लगा कि उसकी सांसे रुकी जा रही है और पांव जमीन में घँसे जा रहे हैं।कमली का रुदन सुनकर तो उसके हाथ से जामुन की टोकरी नीचे गिर गई। सारे जामुन आंगन में बिखर गए और साथ ही रेशमी बालों वाली कलुवा की गुड़िया भी जमीन पर औंधे मुंह गिर कर अपनी सुंदरता के बावजूद निषप्राणता का मुक शोक संदेश देने लगी।
कस्तूरी अपने आप को संभाले हुए जैसे-जैसे घर में दाखिल हुई तो एकाएक सन्न रह गई ।उसके सामने एक शव उसकी फटी पुरानी लुगड़ी(साड़ी)से ढका हुआ भूमि पर रखा हुआ था। स्त्री पुरुष और सहमे =सहमे हुए कुछ बच्चे बैठे टुकुर टुकुर कस्तूरी को ही देखे जा रहे थे।किंतु रेवाराम वहा नहीं था।
कस्तूरी रोई नहीं । बस चुपचाप उस शव को स्नेह से अपनी गोद में लेकर धीरे से बोली=" बेटा कलुवा उठ, देख मैं तेरे लिए रेशमी बालों वाली गुड़िया लाई हूं।जा जाकर उसके साथ खेल ,वह बाहर आंगन में अकेले ही मीठे= मीठे जामुन खा रही है ।मेरे राजा की गुड़िया मेरे कलुवा की गुड़िया *******और रेवाराम इससे बेखबर रोज की तरह उस शाम भी कलाली में बैठा दारू पी रहा था और नशे में बड़बड़ा रहा था=" अच्छी सी गुड़िया कलवा की गुड़िया"
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श्रीकृष्ण खोड़े "किशोर"
11/B= विनायक नगर, उज्जैन रोड ,देवास (मध्य प्रदेश)
Mo=8982656102
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