Love story paheli bar

      पहेली बार, लेखन मारोती गंगासागरे                              मेरे जिंदगी के विस साल बित चूँके है | मै नांदेड शहर के सबसे बड़े यशवंत महाविद्यालय मे बी ए  lll year     मेरे जिंदगी के विस साल बित चूँके है | मै नांदेड शहर के सबसे बड़े यशवंत महाविद्यालय मे बी ए  lll year था , मेरे कॉलेज मे बहूत से दोस्त और सहेलियॉ भी थी | हम सब मिलजुलकर रहते थे | हम सभी की परीक्षाऐ  हो चूँकी थी  गर्मीयों कि छुट्चीयॉ  थी | और हम सब एक - दूसरे से दूर जा रहे थे | तो मै भी मेरे गॉव आया मगर  मन मे हमेशा बेचैनी और उदासी रहती थी | क्यों कि मुझे मेरे क्लास की वह भोलिसी सुरत याद आ रही थी | जिसे देखकर मैने खुद को पहचान लिया था | बाते तो हो रही थी, मगर पहले से कम, तो मैने उसे एक दिन कॉल किया और मिलनेका आमंञण दिया, तो उसने भी गिडगिडाते स्वर मे , " क्यों किस लिए मिलना है, अभी तो बात हुयी| ", " देखों वैसा नही तुम जो सोचती हों... पर पता नही क्यों तूम्हें देखने को दिल करता है , आ जाओं ना... जाने दो तूम्हारी मर्जी |"
     मै ने काफी उदासीनता से कहॉ और कुछ देर हम दोनो ही मोबाईल कान पे लगाकर नि:शब्द मौन कथनो सें बैठे रहें, तो अचानक उसकी आवाज आयी, " हँलो जी कुछ बोलते क्यों नही..! " हॉ बोलना हो, कहो
क्या कहना चाहती हो |", " अरे कुछ नही कहो कहॉ आना हैं मिलने, नाराज हो गऐ क्या तूम | ", " पता नही तुम आओगी या... जाने भी दो तूम्हें समय मिलेगा तब |," " नही- नही मैं अभी आ जाऊँगी बताओ कहॉ आ जाऊँ मैं ", यह सुनकर मै मन ही - मन खूश हो गया ,और खुदको सँभालते हुऐ कहॉ ,  " कहॉ आना पसंद है... तूम्हें...|" तो उसने कहॉ, " तुम ही कहो तूम्हें मिलना है ना... मुझसे | " तो मैने भी थोडासा मुस्कराकर कहॉ, " आ जाओ नांदेड शहर के वजिराबाद कें पास बंन्दा घाट पर  आ जाओं.. ," " ठीक है मै आती हूँ, मगर मुझे थोडी सी देर हो सकती है, तुम इंन्तजार कर ना... अब फोन रखती हूँ मिलते है by | "
       फोन रख दिया तो मेरे मन की अवस्था खुशी से उभर आयी | गर्मीयों के दिन थे ही सुरज भी निडर होकर अपनी ज्वाला को भडका रहॉ था | चारो ओर तेज सफेद चमकती धूप देखनसेे नजर एक जगह रुक न पायी | इसी हाल मे उसके पहले पहूँच चूँका था, वहॉ की उँची जगह पर मै जाके रुक गया और निचे देखने लगा, इतनी कडी धूप मे वहॉ की निचे उतरने की सिडीयॉ तपती हुयी दिखाई दे रही थी |और उसी सिडीयों के नजदीकतासे निचे उतरने का एक रास्ता भी था | जो कि खास प्रेमी युंगलोके लिए भी बनाया होगा पता नही पर उसकी बनावट इतनी सुंदर है कि कोयी भी देखकर खुश हो जाता है | निचे बहती हुयी गोदावरी नदी पानी कम था , क्यों कि गर्मी के दिन थे इसीलिए और भिड भी जादा नही थी  मै यह सब देखकर देखता ही रहॉ क्यों कि मै यहॉ पहली बार गया था वही मेरी प्रेमिका से मिलने ,कुछ युगल बैठे थे बाते कर मै भी उसकी तस्विर ऑखो मे बनाता गया |
     इतने मै पिछे से कोयी आया और मेरी ऑखे उसने अपने  दोनो हाथो से बंद कर ली मै भी चूंप चाप खड़ा रहॉ क्यों कि उसके हाथो की नरमाई और उसका यह मजाक मेरे लिए पहली बार था | तो उसने कहॉ , " पहेचानो तो सही मै कौन ? "  मैने भी कहे दियॉ ," मेरी जान  तुम ही हो, क्यो कैसी हो |" तो उसने खुद की गर्दन निचे झुका ली कुछ कहना था मगर कह ना पायी फिर भी कहॉ ," कैसे हो तुम " यह सुनकर मै उसके लपकते पल्के, लंम्बा सा नाक , और सिर पर स्टॉल हाथ मे घड़ी और बड़ती धूप का पहेरा उसका सुनहरा रंग देखता रहॉ | और कहॉ ," देखो तूम्हारे सामने खड़ा हूँ..., जैसा दिखता हूँ वैसा ही हूँ, तुम कैसी हो | " उसने भी मुस्कान भरे स्वर मे कहॉ ," तूम्हारे जैसा ही हाल है बाकि सब बेहाल है और कुछ नही |"
         मै उसको देखकर यहॉ के प्रकृती की सौदर्य मय छवी मुझे उसके ऑखो मे नजर आ रही थी | और ओ भी है ऐसी की कोयी मेकअप नही फिर भी उसके चेहरे की सुदरता नैसर्गीक तासे झलकता था | मैने उसकी तारीफ मेरी पंक्तियों के माध्यम से बहूत बार कीयी थी मगर आज ओ सामने होकप भी आज उसकी तारीफ मेरे शब्दो मे करना नामुनकिन बन गया था, क्यों कि मैने उसे इतदीकता से पहेली बार देखा था, और उसने भी मुझे |
    वहॉ निचे उतरने के रास्ते सें हम धिरे - धिरे निचे उतर रहे थे, तभी मैने उसकी ओर देखा और कहॉ ," कहो ना... कुछ तो, " " क्या कहूं तुमीने तो मुझे यहॉ ," " ओं... मै तो भुल गया था कि मैने तुम्हें आमंञित किया है अच्छा हुऑ तूमने याद दिलाई |" इतना कहकर मै एकदम सा रुक गया जैसा मै बोलना ही भूल गया हूँ ऐसा कुछ पल के लिए महेसुस हुऑ फिर भी कुछ इस तरहॉ कहने लगा, "देखो हमारे कॉलेज के दिन बित गऐ ,हम नही, मैने तुमसे प्यार किया था , करूँगा और करता रहूंगा |  बस! इतना ही कहना था इसीलिए तूम्हें यहॉ पर... देखो इतनी धूप मे आने का कष्ट किया इसीलिए आपका धन्यवाद ,शुक्रियॉ कुछ तुम भी कहो ना... मै भी कुछ सुनना चाहता हूँ , तुम सुनना चाहती हो तो नही तो नही | " मेरा सारा शरिर पसीने से भिग चूंका था पता नही क्यो पर मन मे एक अजबसा डर महेसुस हो रहा था | मै आपको उपर से एक अच्छा खासा दिखाने की कोशिष कर रहॉ था | क्यो कि मेरे मन मे उसे खोने का डर था और यही डर उसके भी मन था या नही पता नही पर उसके बातो से कुछ ऐसा लग रहॉ था |
     तभी उसने कहॉ , " चलो चलते है | " मैंने भी कहॉ ," हॉ मुझे भी जाना है |" इतना कहकर वह पिछे मुडकर कुछ दूर चली गयी और मै देख रहॉ था मै भी निकलने वाला ही था | तो अचानक मेरे मुह से आवाज निकली , " रुक जाओं सुनों... " वह पिछे मुडकर मेरे पास चली आयी मैने भी उसके दोनो हाथ अपने हाथ मे पकड लिए और इसी अवस्था मे खडे रहकर एक- दूसरे के ऑखो मे देखने लगे तो उसने भी शर्माकर ऑखे बंद कर ली |  और नि:शब्द होकर खड़ी रही, कुछ समय के बाद उसने ऑखे खोली तो उसके चेहरे पर एक नयी मुस्कान देखने को मिली जो कि मै देखना चाहता था | ओ अहसास मुझे उसके चेहरे पर पहली बार देखने को मिल गया तो मैने  उसके माथे का चूँमन लिया वह शर्मके मारे थरथराने लगी और मै भी |
      तभी दोनो एक- दूसरे का हाथ - हाथमे पकडकर सिडीयों से उपर आ रहे थे , तो उसने कहॉ , " यह मिलना - जुलना और बाते करना हमारा जारी रहेगा |" उसकी यह बाते सुनकर आज मुझे इतनी कड़ी धूप मे भी शितल छाया महेसुस हो रही थी |   और हम दोनो का एक-दूसरे को इतनी नजदीकता से देखना पहली बार था|
        यह सब मेरे लिए और उसके लिए भी पहली बार था...|
था , मेरे कॉलेज मे बहूत से दोस्त और सहेलियॉ भी थी | हम सब मिलजुलकर रहते थे | हम सभी की परीक्षाऐ  हो चूँकी थी  गर्मीयों कि छुट्चीयॉ  थी | और हम सब एक - दूसरे से दूर जा रहे थे | तो मै भी मेरे गॉव आया मगर  मन मे हमेशा बेचैनी और उदासी रहती थी | क्यों कि मुझे मेरे क्लास की वह भोलिसी सुरत याद आ रही थी | जिसे देखकर मैने खुद को पहचान लिया था | बाते तो हो रही थी, मगर पहले से कम, तो मैने उसे एक दिन कॉल किया और मिलनेका आमंञण दिया, तो उसने भी गिडगिडाते स्वर मे , " क्यों किस लिए मिलना है, अभी तो बात हुयी| ", " देखों वैसा नही तुम जो सोचती हों... पर पता नही क्यों तूम्हें देखने को दिल करता है , आ जाओं ना... जाने दो तूम्हारी मर्जी |"
     मै ने काफी उदासीनता से कहॉ और कुछ देर हम दोनो ही मोबाईल कान पे लगाकर नि:शब्द मौन कथनो सें बैठे रहें, तो अचानक उसकी आवाज आयी, " हँलो जी कुछ बोलते क्यों नही..! " हॉ बोलना हो, कहो
क्या कहना चाहती हो |", " अरे कुछ नही कहो कहॉ आना हैं मिलने, नाराज हो गऐ क्या तूम | ", " पता नही तुम आओगी या... जाने भी दो तूम्हें समय मिलेगा तब |," " नही- नही मैं अभी आ जाऊँगी बताओ कहॉ आ जाऊँ मैं ", यह सुनकर मै मन ही - मन खूश हो गया ,और खुदको सँभालते हुऐ कहॉ ,  " कहॉ आना पसंद है... तूम्हें...|" तो उसने कहॉ, " तुम ही कहो तूम्हें मिलना है ना... मुझसे | " तो मैने भी थोडासा मुस्कराकर कहॉ, " आ जाओ नांदेड शहर के वजिराबाद कें पास बंन्दा घाट पर  आ जाओं.. ," " ठीक है मै आती हूँ, मगर मुझे थोडी सी देर हो सकती है, तुम इंन्तजार कर ना... अब फोन रखती हूँ मिलते है by | "
       फोन रख दिया तो मेरे मन की अवस्था खुशी से उभर आयी | गर्मीयों के दिन थे ही सुरज भी निडर होकर अपनी ज्वाला को भडका रहॉ था | चारो ओर तेज सफेद चमकती धूप देखनसेे नजर एक जगह रुक न पायी | इसी हाल मे उसके पहले पहूँच चूँका था, वहॉ की उँची जगह पर मै जाके रुक गया और निचे देखने लगा, इतनी कडी धूप मे वहॉ की निचे उतरने की सिडीयॉ तपती हुयी दिखाई दे रही थी |और उसी सिडीयों के नजदीकतासे निचे उतरने का एक रास्ता भी था | जो कि खास प्रेमी युंगलोके लिए भी बनाया होगा पता नही पर उसकी बनावट इतनी सुंदर है कि कोयी भी देखकर खुश हो जाता है | निचे बहती हुयी गोदावरी नदी पानी कम था , क्यों कि गर्मी के दिन थे इसीलिए और भिड भी जादा नही थी  मै यह सब देखकर देखता ही रहॉ क्यों कि मै यहॉ पहली बार गया था वही मेरी प्रेमिका से मिलने ,कुछ युगल बैठे थे बाते कर मै भी उसकी तस्विर ऑखो मे बनाता गया |
     इतने मै पिछे से कोयी आया और मेरी ऑखे उसने अपने  दोनो हाथो से बंद कर ली मै भी चूंप चाप खड़ा रहॉ क्यों कि उसके हाथो की नरमाई और उसका यह मजाक मेरे लिए पहली बार था | तो उसने कहॉ , " पहेचानो तो सही मै कौन ? "  मैने भी कहे दियॉ ," मेरी जान  तुम ही हो, क्यो कैसी हो |" तो उसने खुद की गर्दन निचे झुका ली कुछ कहना था मगर कह ना पायी फिर भी कहॉ ," कैसे हो तुम " यह सुनकर मै उसके लपकते पल्के, लंम्बा सा नाक , और सिर पर स्टॉल हाथ मे घड़ी और बड़ती धूप का पहेरा उसका सुनहरा रंग देखता रहॉ | और कहॉ ," देखो तूम्हारे सामने खड़ा हूँ..., जैसा दिखता हूँ वैसा ही हूँ, तुम कैसी हो | " उसने भी मुस्कान भरे स्वर मे कहॉ ," तूम्हारे जैसा ही हाल है बाकि सब बेहाल है और कुछ नही |"
         मै उसको देखकर यहॉ के प्रकृती की सौदर्य मय छवी मुझे उसके ऑखो मे नजर आ रही थी | और ओ भी है ऐसी की कोयी मेकअप नही फिर भी उसके चेहरे की सुदरता नैसर्गीक तासे झलकता था | मैने उसकी तारीफ मेरी पंक्तियों के माध्यम से बहूत बार कीयी थी मगर आज ओ सामने होकप भी आज उसकी तारीफ मेरे शब्दो मे करना नामुनकिन बन गया था, क्यों कि मैने उसे इतदीकता से पहेली बार देखा था, और उसने भी मुझे |
    वहॉ निचे उतरने के रास्ते सें हम धिरे - धिरे निचे उतर रहे थे, तभी मैने उसकी ओर देखा और कहॉ ," कहो ना... कुछ तो, " " क्या कहूं तुमीने तो मुझे यहॉ ," " ओं... मै तो भुल गया था कि मैने तुम्हें आमंञित किया है अच्छा हुऑ तूमने याद दिलाई |" इतना कहकर मै एकदम सा रुक गया जैसा मै बोलना ही भूल गया हूँ ऐसा कुछ पल के लिए महेसुस हुऑ फिर भी कुछ इस तरहॉ कहने लगा, "देखो हमारे कॉलेज के दिन बित गऐ ,हम नही, मैने तुमसे प्यार किया था , करूँगा और करता रहूंगा |  बस! इतना ही कहना था इसीलिए तूम्हें यहॉ पर... देखो इतनी धूप मे आने का कष्ट किया इसीलिए आपका धन्यवाद ,शुक्रियॉ कुछ तुम भी कहो ना... मै भी कुछ सुनना चाहता हूँ , तुम सुनना चाहती हो तो नही तो नही | " मेरा सारा शरिर पसीने से भिग चूंका था पता नही क्यो पर मन मे एक अजबसा डर महेसुस हो रहा था | मै आपको उपर से एक अच्छा खासा दिखाने की कोशिष कर रहॉ था | क्यो कि मेरे मन मे उसे खोने का डर था और यही डर उसके भी मन था या नही पता नही पर उसके बातो से कुछ ऐसा लग रहॉ था |
     तभी उसने कहॉ , " चलो चलते है | " मैंने भी कहॉ ," हॉ मुझे भी जाना है |" इतना कहकर वह पिछे मुडकर कुछ दूर चली गयी और मै देख रहॉ था मै भी निकलने वाला ही था | तो अचानक मेरे मुह से आवाज निकली , " रुक जाओं सुनों... " वह पिछे मुडकर मेरे पास चली आयी मैने भी उसके दोनो हाथ अपने हाथ मे पकड लिए और इसी अवस्था मे खडे रहकर एक- दूसरे के ऑखो मे देखने लगे तो उसने भी शर्माकर ऑखे बंद कर ली |  और नि:शब्द होकर खड़ी रही, कुछ समय के बाद उसने ऑखे खोली तो उसके चेहरे पर एक नयी मुस्कान देखने को मिली जो कि मै देखना चाहता था | ओ अहसास मुझे उसके चेहरे पर पहली बार देखने को मिल गया तो मैने  उसके माथे का चूँमन लिया वह शर्मके मारे थरथराने लगी और मै भी |
      तभी दोनो एक- दूसरे का हाथ - हाथमे पकडकर सिडीयों से उपर आ रहे थे , तो उसने कहॉ , " यह मिलना - जुलना और बाते करना हमारा जारी रहेगा |" उसकी यह बाते सुनकर आज मुझे इतनी कड़ी धूप मे भी शितल छाया महेसुस हो रही थी |   और हम दोनो का एक-दूसरे को इतनी नजदीकता से देखना पहली बार था|
        यह सब मेरे लिए और उसके लिए भी पहली बार था...|

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