जीवन में असफलता भी जरूरी है

  

जीवन यह संघर्ष से भरा हुआ है । इसमें कभी सुख है तो कभी दुःख है यह जीवन के दो किनारे है इसमें ही बहते रहना ही जीवन की सही परिभाषा होगी । जीवन में कभी दुःख आए तो ज्यादा निरुत्साही , दुःखी नहीं होना चाहिए और सुख आने से या अच्छे दिन आने से ज्यादा उड़ना भी नहीं चाहिए । दोनों स्थितियों में स्थिरता और धैर्य ही इंसान के पास होना चाहिए तभी वह सही और जीवन जी सकता है।
किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते समय या , अन्य कोई जीवन सुधारने वाला , अच्छा कार्य करते हो तो उसमें निरंतरता , अखंडता , प्राणिकता और ईमानदारी ये यही गुण इंसानों में सफलता की कुंजी होती है । बहुत से छात्र पढ़ाई करते तो है मगर उनमें उपयुक्त गुणों की कमी होती है तो वह जल्दी ही खुद का मनोबल खो देते है इसलिए वह जल्द ही गलत रास्ता अपना लेते है। शारीरिक , भौतिक और मानसिक इन अवस्थाओं में इंसान का विकास होता है इसमें मासिक स्तर पर मजबूर होना बहुत ही जरूरी होता है ।

     कभी असफलता मिले तो निराश नहीं होना चाहिए ।निराशा आती है तो भी खुद को संभालकर , थोड़ा रुककर और खुद की गलतियों का परीक्षण करके और जो खुद की गलतियाँ हुई है उनको सुधारकर फिर से उसी रण में नए नीति के साथ खुद को तैयार करो तो सफलता आपकी ही होगी । दूसरी बात यह है कि एक ही पढ़ाई आप दुबार दे रहे हो , एक ही पाठ्यक्रम आप फिर से पढ़ रहे हो तो आपकी पढ़ाई और पढ़ाई स्तर निश्चित ही ओर से बढ़ा हुआ ही रहेगा । मेरा मानना है कि जीवन में असफलता भी जरूरी है क्यों कि तभी आप को सफलता का मूल्य समझ आएगा अन्यथा आप सफलता से खुश होंगे मगर उस सफलता का मूल्य , आपका संघर्ष आपको समझ नहीं आएगा । कहते है कि , 'असफलता सफलता की पहली सीढ़ी है ।' यह बिल्कुल ही सही मेरा कहना इतना ही है कि असफल हुए तो भी निराश मत होना क्यों कि असफल होकर फिर सफल होते हो तो आपका ज्ञान और सफलता की खुशी में वृद्धि होती है।

   जिस प्रकार धरती पर तीन ऋतु है वैसे ही मनुष्य जीवन में भी उतार चढ़ाव होता है। जब गर्मी का मौसम जदरदस्त और कड़ाकेदार होता है तभी बारिश लाजवाब होती है और फिर सर्दी भी मजेदार होती है। वैसे ही जीवन की अवस्थाएं भी एक के ऊपर एक निर्भर होती है।

 किसी भी पेड़ के पत्ते झड़ते है, धूप में  वह तपता है और फिर बारिश में मस्त हराभरा होकर डालता है । इंसानी जीवन भी वैसा ही है।

जीवन में जितनी आवश्यकता सफलता की होती है उतनी ही आवश्यकता असफलता की भी होती है। असफलता का भी हँसकर स्वीकार करो और गलतियों को सुधारकर आगे बढ़ो ।

लेखक 

प्रा .मारोती गंगासागरे 



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