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जागतिक महिला दिवस के अवसर पर कविता वर्दानी

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      वर्दानी   ---------------- भारत की नारी आदिकाल से सदा रही मर्दानी। दुश्मन के शीश उतारे रण में सदा रही वर्दानी। हर काल में नर के संग- संग इतिहास रचे नारी ने। अगर किसी ने आंख उठाई बन गई काल भवानी। मेहनत से रिश्ता सदा रखा कभी न पीठ दिखाई। रूखी सूखी खा कर के घर की लाज बचाई। आन बान शान की खातिर लिखती नई कहानी। सावित्री जैसी दृढ़ नारी से यम ने हारी मानी। कभी किसी का बुरा न सोचे सबकी करे भलाई। नटवर की दीवानी बनकर प्रेम की ज्योति जलाई। अंग्रेजों ने पानी मांगा झांसी की रानी से। पदमा दुर्गा सारंधा की अनुपम शौर्य जवानी। जेठ की कड़ी दोपहरी भी नारी से घबराए। सावन में मेघों के संग मस्ती में नाचे गाए। युग बदले हैं नारी ने सदा रही बलिदानी। विजय पताका फहराया नारी ने जब भी ठानी।          -----------------                                    भास्कर सिंह माणिक, कोंच

कलुवा की गुड़िया"

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कहानी= ="कलुवा की गुड़िया"=             कस्तूरी ने बड़े ही बुझे मन से अपने हलक से दो=चार कोर उतारे और हाथ धो, पानी पीकर अपनी लुगड़ी (साड़ी )के पल्लू से हाथ पोछ झोली में सो रहे अपने 3 वर्षीय बेटे कलुवा के पास आ एक बार फिर उसके गाल को हल्के से छुआ ।अब बुखार कुछ कम हो गया था ।उसकी लड़की कमली अपने पिता रेवाराम के साथ रोटी खाकर अपने छोटे भाई कलुआ को झोली में सुलाते =सुलाते खुद जमीन पर ही सो गई थी और आज सुबह कमली को कलवा का ध्यान रखने का कहकर वह खुद दाडकी (मजदूरी )के लिए चली गई थी ।अब उसे छबड़ी (टोकरी) उठा फेरा लगाने जाना था उसका पति रोज सूरज सिर चढ़े ही उठता और मन होता तो अपने सुतारी के काम में लग जाता। इसके बाद उसे दिन में 10 बार चाय चाहिए और मुंह में बीडी भले ही दिन में खाना मिले या ना मिले लेकिन रात को थकान मिटाने के लिए दारु जरूरी थी।      शहर के पास बसे इस छोटे से गांव नुमां कस्बे में रेवाराम कोई  8 बरस पहले कस्तूरी को ब्याह कर लाया था। कस्तूरी ने यही तीन संतानों को जन्म दिया था जिनमें सबसे बड़ी लड़की कमली दूसरा सूरज जो कुपोषण का शिकार ह...