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मैं विश्वनाथ का नंदी हूँ

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मैं विश्वनाथ का नंदी हूँ मैं विश्वनाथ का नंदी हूँ, दे दो मेरा अधिकार मुझे। वापी में हैं मेरे बाबा, कर दो सम्मुख-साकार मुझे।। अब तो जागो हे सनातनी, डम- डमडम डमरू बोल रहा। न्यायालय आकर वापी में, इतिहास पुराने खोल रहा।। अब बहुत छुप चुके हे बाबा, करने दो जय-जयकार मुझे। एक विदेशी खानदान ने, मंदिर को नापाक किया था। मूल निवासी सनातनी के, काट कलेजा चाक किया था।। औरंगजेब नाम था उसका, वह धर्मांध विनाशक था। भारत माता के आँचल का, वह कपूत था,नाशक था।। आस्तीन में साँप पले थे, बहु बार मिली थी हार मुझे। ले रहा समय अब अँगड़ाई, खुल रहे नयन सुविचार करो। बहुत सो चुके हे मनु वंशज, उठ पुनः नया उपचार करो।। लख रहा दूर से बेसुध मैं, वर्षों से बाबा दिखे नहीं। मैं अपलक चक्षु निहार रहा, विधि भी आकर कुछ लिखे नहीं।। अवध अहिल्या भक्तिन जैसा, दिख नहीं रहा अवतार मुझे। डॉ अवधेश कुमार अवध साहित्यकार व अभियंता संपर्क 8787573644

धार्मिक ग्रंथों की पुनः मीमांसा आवश्यक

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धार्मिक ग्रंथों की पुनः मीमांसा आवश्यक डॉ अवधेश कुमार अवध समय के साथ प्राचीन काल के कई शब्दों के अर्थ बदल चुके हैं। कुछ शब्दों के अर्थ अपने पर्याय से इतर रूढ़ हो गए हैं। उनका रूढ़त्व विपरीत अर्थ या अनर्थ तक पहुँच गया है। संस्कृत या हिंदी काव्यों का काव्य सौष्ठव भी आज जन साधारण के लिए कठिनाई का कारण है। इसी संदर्भ में आचार्य केशव दास को "कठिन काव्य का प्रेत" का संबोधन मिला था। अलंकारों के झंकारों में काव्य में रस एवं रुचि की निष्पत्ति सुगम होती है जो समझ में न आने पर नुकसानदायक भी है। इसी तरह शब्द शक्ति त्रय यथा- अभिधा, लक्षणा और व्यंजना को आज के समय में या तो हम समझना भूल गए हैं या समझना नहीं चाहते और स्वार्थवश दुरुपयोग भी करते हैं।  एक और कमी प्रायः देखी जा सकती है। किसी विषय को ठीक से जाने या समझे बिना अपनी विशेषज्ञ राय प्रस्तुत करना। "नीम हकीम खतरे जान" केवल झोला छाप डाक्टरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि प्रायः सभी क्षेत्रों में इसके अंगद पाँव जमे हैं। विशेषज्ञता की योग्यता के बिना ही बिना किसी लाज-शर्म के तत्संबंधी विषय में राय लेने और देने का खेल, सामान्य जन मानस के...

कबीर और तुलसी को बाँटने वाले नासमझ हैं**कबीर के उद्देश्य को तुलसी ने पूर्ण किया**कबीर और तुलसी दोनों हिंदुत्व के पोषक थे*

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*कबीर और तुलसी को बाँटने वाले नासमझ हैं* *कबीर के उद्देश्य को तुलसी ने पूर्ण किया* *कबीर और तुलसी दोनों हिंदुत्व के पोषक थे* डॉ अवधेश कुमार अवध संत कबीर के जन्म के बारे में प्रचलित कहानियों का निचोड़ यह है कि ये लहरतारा सरोवर के किनारे पाए गए। एक जुलाहे दम्पत्ति ने इनका लालन- पालन किया और ये भी जुलाहे का काम करने लगे। उस समय काशी जनपद में जुलाहे हिंदू नहीं थे पर अन्य मुसलमानों की तरह कट्टर मुसलमान भी नहीं थे। अर्थात् रोजी-रोटी के जुगाड़ में ये सूत कातने वाले सामान्य सर्वहारा थे। शायद इसीलिए कबीर कभी भी इस्लाम या मुसलमानों से प्रभावित नहीं दिखे। जबकि साधारण मुसलमान अवश्य कबीर से प्रभावित थे। कुछ बड़े होने पर कबीर उस समय के वैष्णव गुरु रामानन्द को गुरु बनाने पर अटल रहे। यदि कबीर का परिवार कट्टर मजहबी होता तो पालित बेटे द्वारा यह सोचना भी सम्भव नहीं था। कबीर ने ब्राह्मणों के घोर विरोध और गुरु रामानन्द द्वारा बार-बार ठुकराए जाने के बाद भी उनको ही गुरु माना। अन्ततः रामानन्द ने कबीर को अपने शिष्यों में प्रथम स्थान दिया।  कबीर जीवन पर्यंत "राम" को जपते रहे और "राम" से परिचय क...

वसंत के आगमन पर वसंत की खोज

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वसंत के आगमन पर वसंत की खोज - डॉ अवधेश कुमार अवध वसंत उल्लास का नाम है। कंगाली बिहु के बाद आये भोगाली बिहु में पूर्ण उदर संतुष्टि का नाम है। ठंड से ठिठुरती अधनंगी देह को मिली धूप की सौगात का नाम है। धरा के सप्तवर्णी श्रृंगार का नाम है। भगवान भास्कर के दिशि परिवर्तन का नाम है। आम के बौर के सँग मन बौराने की मादकता का नाम है। काक और पिक के बीच चरित्र उजागर होने का नाम है। फाग के झाग में डुबकी लगाने का नाम है। पावन प्रकृति के मुस्कुराने का नाम है। नाम तो होलिका के जलकर मरने से भी जुड़ा है। श्रीराम जन्मोत्सव श्रीराम नवमी के आगमन की पावन पृष्ठभूमि के पूर्व काल से भी जुड़ा है। वसंत तो हर वर्ष आता है। पहले भी आता था। पहले के पहले भी। सदियों पहले भी। एक बात नहीं भूलना चाहिए कि यह प्रमुखतः भारत में ही आता है साथ ही कुछ पड़ोसियों के यहाँ भी। शेष दुनिया तो बस इसके बारे में सोच सकती है। सुन भी सकती है। भोग भी सकती है लेकिन भारत में आकर ही। दूर से नहीं। कदापि नहीं। पहले यह जब आने को होता था तो प्रकृति आगमन से पूर्व तैयारी करती थी। बेसब्री से इंतजार करती थी। न केवल स्वयं का बल्कि सकल सचराचर का भी। मगर अ...